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विरोध प्रदर्शन पर कितनी आजादी, कितनी पाबंदी? जानिए क्या कहता है कानून
 

 

नई दिल्ली। लोकतंत्र में सरकार की नीतियों के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करने का सबसे प्रभावी माध्यम विरोध प्रदर्शन माना जाता है। भारतीय संविधान भी नागरिकों को यह अधिकार प्रदान करता है, लेकिन हाल के वर्षों में यह बहस तेज हो गई है कि क्या आम नागरिक वास्तव में अपने शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार का स्वतंत्र रूप से उपयोग कर पा रहे हैं।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(b) के तहत प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा बिना हथियार के शांतिपूर्ण ढंग से एकत्र होने का मौलिक अधिकार प्राप्त है। लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती इसी अधिकार पर आधारित है। हालांकि, सिटीजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस (CJP) की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अदालतों के बदलते दृष्टिकोण, धारा 144 (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163) के बार-बार उपयोग और प्रशासनिक प्रतिबंधों के कारण यह अधिकार व्यवहारिक रूप से सीमित होता जा रहा है।

देश की राजधानी दिल्ली स्थित जंतर-मंतर लंबे समय से विरोध प्रदर्शनों का प्रमुख केंद्र रहा है। लेकिन यहां प्रदर्शन आयोजित करने के लिए कई निर्धारित नियमों का पालन करना अनिवार्य है। प्रदर्शन या धरने के लिए आयोजकों को 7 से 10 दिन पहले दिल्ली पुलिस से अनुमति लेनी होती है। इसके लिए निर्धारित आवेदन पत्र भरना आवश्यक है। इसके अलावा प्रदर्शन का समय सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक सीमित है।

जंतर-मंतर पर मंच या अस्थायी टेंट लगाने के लिए अलग से पुलिस की मंजूरी लेनी पड़ती है। वहीं, कानून-व्यवस्था बनाए रखने के उद्देश्य से आयोजकों को अपने स्वयंसेवकों की पूरी सूची भी पुलिस प्रशासन को उपलब्ध करानी होती है।

इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट भी अपना रुख स्पष्ट कर चुका है। शाहीन बाग मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि विरोध प्रदर्शन लोकतंत्र का अभिन्न हिस्सा हैं और सरकार को उनका सम्मान करना चाहिए। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि यह अधिकार पूर्णतः असीमित नहीं है और सार्वजनिक व्यवस्था तथा कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए इस पर उचित और तार्किक प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

सीजेपी जैसी संस्थाओं का मानना है कि प्रदर्शन स्थलों की सीमित उपलब्धता, प्रशासनिक शर्तों और बढ़ती पाबंदियों के कारण नागरिकों की लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति प्रभावित हो सकती है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि अधिकार और प्रतिबंधों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए, ताकि लोकतंत्र की मूल भावना भी सुरक्षित रहे और सार्वजनिक व्यवस्था भी बनी रहे।