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छात्रों की आवाज दबाई तो चुप नहीं रहेंगी अदालतें… CJI सूर्यकांत का पुलिस-प्रशासन को साफ संदेश
 

 

पटना। भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने शनिवार को कहा कि छात्रों को शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने और विरोध-प्रदर्शन करने का संवैधानिक अधिकार है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि पुलिस या प्रशासन बल प्रयोग कर छात्रों की आवाज दबाने का प्रयास करता है, तो अदालतें ऐसे मामलों में मूकदर्शक नहीं रहेंगी।

मुख्य न्यायाधीश पटना के चाणक्य राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (CNLU) के अशोक ऑडिटोरियम में आयोजित ‘ओपन हाउस’ संवाद में छात्रों और युवा अधिवक्ताओं से बातचीत कर रहे थे। न्यायमूर्ति सूर्यकांत 26 सितंबर को पटना में विभिन्न न्यायिक और विधिक कार्यक्रमों में भाग लेने पहुंचे हैं।

छात्रा ने उठाया पुलिस कार्रवाई का मुद्दा

संवाद के दौरान विधि की एक छात्रा ने विश्वविद्यालय परिसरों और सड़कों पर होने वाले शांतिपूर्ण छात्र आंदोलनों पर पुलिस कार्रवाई का मुद्दा उठाया। छात्रा ने सवाल किया कि जब विद्यार्थी अपने अधिकारों की मांग को लेकर लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन करते हैं, तब पुलिस बल प्रयोग की स्थिति में न्यायपालिका उनके अधिकारों की रक्षा कैसे करती है।

इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि संविधान नागरिकों, विशेषकर युवाओं को अपनी असहमति व्यक्त करने और शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करने का अधिकार देता है। उन्होंने कहा कि यदि कोई आंदोलन संवैधानिक और शांतिपूर्ण दायरे में है, तो छात्रों के अधिकारों के संरक्षण के लिए अदालतों के दरवाजे खुले हैं।

युवा वकीलों के लिए वित्तीय सहायता की जरूरत

कार्यक्रम में मुख्य न्यायाधीश ने युवा अधिवक्ताओं, खासकर पहली पीढ़ी के वकीलों के सामने शुरुआती वर्षों में आने वाली आर्थिक और व्यावसायिक चुनौतियों पर भी चर्चा की।

सारिका त्यागी प्रकरण का उल्लेख करते हुए उन्होंने युवा अधिवक्ताओं को शुरुआती व्यावसायिक दौर में आर्थिक सहयोग देने के लिए एक समर्पित Professional Assistance Corpus की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि ऐसी व्यवस्था को दान के रूप में नहीं, बल्कि विधि व्यवसाय के भविष्य को मजबूत करने वाली संरचनात्मक सहायता के रूप में देखा जाना चाहिए।

पांच साल के लॉ कोर्स में बदलाव का सुझाव

सीएनएलयू के कुलपति प्रो. फैजान मुस्तफा ने पांच वर्षीय विधि पाठ्यक्रम को चार वर्ष की अकादमिक पढ़ाई और अंतिम वर्ष में अनिवार्य न्यायालयीय अप्रेंटिसशिप के रूप में पुनर्गठित करने का सुझाव दिया।

उनका कहना था कि इससे छात्रों को पढ़ाई के दौरान ही व्यावहारिक न्यायालयीय अनुभव मिल सकेगा और न्यायिक सेवा परीक्षाओं के लिए अलग से एक वर्ष की प्रैक्टिस की आवश्यकता पर भी पुनर्विचार किया जा सकेगा।

मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने इस प्रस्ताव को “एक नया और स्वागत योग्य विचार” बताया। कार्यक्रम में सीएनएलयू के कुलसचिव प्रो. एसपी सिंह समेत विश्वविद्यालय के शिक्षक, विद्यार्थी और विधि जगत से जुड़े लोग मौजूद रहे।