India का U-Turn? FDI पॉलिसी में बदलाव से चीनी निवेशकों के लिए खुला रास्ता
New Delhi : मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और कूटनीतिक संतुलन के बीच भारत सरकार ने चीनी कंपनियों के लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) नीति में अहम बदलाव किया है। उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) ने सोमवार को नई अधिसूचना जारी की, जिसके तहत 10 प्रतिशत तक चीनी हिस्सेदारी वाली विदेशी कंपनियों को ऑटोमैटिक रूट के माध्यम से निवेश की अनुमति दी गई है।
नया नियम क्या कहता है?
पहले, सीमावर्ती देशों की किसी भी हिस्सेदारी वाले निवेशकों को भारत में निवेश के लिए सरकारी मंजूरी लेना अनिवार्य था। अब यह नियम केवल ‘लाभकारी स्वामित्व’ (Beneficial Ownership) पर लागू होगा। यानी वास्तविक स्वामी की पहचान के आधार पर ही मंजूरी की आवश्यकता तय की जाएगी।
लाभकारी स्वामित्व की परिभाषा
नए नियमों के अनुसार, पीएमएलए (Prevention of Money Laundering Act, 2002) के प्रावधानों के मुताबिक किसी कंपनी में 10 प्रतिशत या उससे अधिक हिस्सेदारी रखने वाला व्यक्ति या संस्था लाभकारी स्वामी मानी जाएगी।
पुराने नियम का इतिहास
कोविड-19 महामारी के दौरान भारत सरकार ने 17 अप्रैल 2020 को Press Note 3 (2020) जारी किया था। इसके तहत भारत से भूमि सीमा साझा करने वाले देशों के निवेशकों (जिनमें China, Pakistan, Bangladesh, Nepal, Bhutan, Myanmar और Afghanistan शामिल थे) को सरकारी मंजूरी अनिवार्य कर दी गई थी। इस नीति का असर वैश्विक प्राइवेट इक्विटी (PE) और वेंचर कैपिटल (VC) फंड्स पर भी पड़ा था, खासकर उन कंपनियों पर जिनमें चीनी या हांगकांग निवेशकों की मामूली हिस्सेदारी थी।
नई अधिसूचना के अनुसार
यदि किसी निवेशक इकाई में इन देशों के नागरिकों या संस्थाओं की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हिस्सेदारी है और उसे अब सरकारी मंजूरी की जरूरत नहीं है, तो ऐसे निवेशों को DPIIT की तय प्रक्रिया के तहत रिपोर्ट करना होगा।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल 2000 से दिसंबर 2025 तक भारत में कुल FDI इक्विटी प्रवाह में China की हिस्सेदारी मात्र 0.32 प्रतिशत रही है। इस बदलाव से निवेश प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ेगी और छोटे हिस्सेदार वाले चीनी निवेशकों के लिए निवेश में आसानी होगी, जबकि भारत की सुरक्षा और कूटनीतिक संतुलन भी कायम रहेगा।