दशकों बाद जड़ों की तलाश में कश्मीर पहुंचे कश्मीरी पंडित, मंदिरों में छलके आंसू, ताजा हुईं पुरानी यादें
Srinagar : अपनी सांस्कृतिक पहचान और पुश्तैनी विरासत से जुड़ने के उद्देश्य से देश और विदेश में रहने वाले कश्मीरी पंडितों का एक प्रतिनिधिमंडल इन दिनों कश्मीर घाटी के दौरे पर है। ‘ग्लोबल कश्मीरी पंडित हेरिटेज टूर कॉन्क्लेव’ के तहत आयोजित इस विशेष यात्रा में बड़ी संख्या में युवा शामिल हैं, जिनमें से कई पहली बार अपने पूर्वजों की धरती कश्मीर पहुंचे हैं।
यात्रा के दौरान प्रतिनिधिमंडल ने घाटी के कई ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों का भ्रमण किया तथा पूजा-अर्चना में हिस्सा लिया। श्रीनगर के पुराने शहर स्थित गणपतयार मंदिर में आयोजित हवन और पूजा के दौरान कई प्रतिभागी भावुक नजर आए। उन्होंने बताया कि बचपन से अपने माता-पिता और दादा-दादी से इस मंदिर की कहानियां सुनते आए थे, लेकिन पहली बार यहां पहुंचकर उन्हें अपनी जड़ों से जुड़ने का वास्तविक अनुभव हुआ।
प्रतिभागियों ने कहा कि मंदिर परिसर में पहुंचते ही परिवार की पुरानी यादें और विस्थापन से जुड़ी कहानियां आंखों के सामने ताजा हो गईं। कई लोगों की आंखें नम हो गईं क्योंकि यह स्थल उनके पारिवारिक इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।
प्रमुख धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों का किया भ्रमण
श्रीनगर पहुंचने से पहले प्रतिनिधिमंडल ने बडगाम जिले के बीरवाह क्षेत्र में स्थित अभिनवगुप्त गुफा का दौरा किया। इसके अलावा अनंतनाग स्थित ऐतिहासिक मार्तंड सूर्य मंदिर में श्रद्धा अर्पित की गई। यात्रा के दौरान समूह गांदरबल जिले के तुलमुल्ला गांव स्थित प्रसिद्ध माता खीर भवानी मंदिर भी पहुंचा, जहां श्रद्धालुओं ने पूजा-अर्चना कर अपनी कुलदेवी का आशीर्वाद प्राप्त किया।
प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों का कहना है कि इस यात्रा ने उन्हें केवल धार्मिक स्थलों के दर्शन ही नहीं कराए, बल्कि कश्मीर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और अपने समुदाय के गौरवशाली इतिहास को समझने का अवसर भी प्रदान किया।
‘यह केवल यात्रा नहीं, पहचान की खोज है’
प्रतिनिधिमंडल के सदस्य ने कहा कि यह कार्यक्रम सामान्य पर्यटन यात्रा नहीं, बल्कि अपनी पहचान और जड़ों को पुनः खोजने का प्रयास है। उन्होंने कहा कि कई युवा पहली बार उस भूमि पर पहुंचे हैं जहां उनके पूर्वज रहते थे। ऐसे में अपने इतिहास और संस्कृति से जुड़े स्थलों को देखना उनके लिए गर्व और भावनाओं से भरा अनुभव है।
प्रतिभागी सुनीता ने कहा कि कश्मीर की धरती पर कदम रखते ही पुरानी स्मृतियां ताजा हो गईं। उन्होंने उम्मीद जताई कि भविष्य में ऐसा समय आएगा जब विस्थापित कश्मीरी पंडित अपने घरों और मोहल्लों में फिर से लौट सकेंगे।
विरासत संरक्षण की उठी मांग
प्रतिनिधिमंडल ने सरकार और संबंधित विभागों से कश्मीर के ऐतिहासिक एवं धार्मिक स्थलों के संरक्षण, सुरक्षा और विकास के लिए विशेष प्रयास करने की मांग की। उनका कहना है कि इन धरोहरों का संरक्षण न केवल कश्मीरी पंडित समुदाय की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी अपनी विरासत से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
समुदाय के लोगों का मानना है कि यह यात्रा केवल धार्मिक आस्था का कार्यक्रम नहीं, बल्कि कश्मीर की साझा सांस्कृतिक विरासत, सामाजिक सद्भाव और ऐतिहासिक पहचान को पुनर्जीवित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।