लाल बहादुर शास्त्री की अनसुनी कहानी: बचपन में गंगा तैरकर पहुंचते थे स्कूल, PM रहते लिया था कार के लिए लोन
लाल बहादुर शास्त्री का जीवन संघर्ष, सादगी और दृढ़ इच्छाशक्ति की मिसाल रहा। बचपन में नाव के पैसे नहीं होने पर वह गंगा तैरकर स्कूल जाते थे। स्वतंत्रता आंदोलन में जेल जाने से लेकर रेल मंत्री पद से इस्तीफा और प्रधानमंत्री बनने तक उनके जीवन से जुड़े कई प्रसंग आज भी प्रेरणा देते हैं।
Lal Bahadur Shastri Jayanti: देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का जीवन सादगी, संघर्ष और दृढ़ इच्छाशक्ति से भरा रहा। बचपन में आर्थिक परेशानियों के बावजूद उन्होंने पढ़ाई नहीं छोड़ी। हालात ऐसे थे कि स्कूल जाने के लिए नाव का किराया तक नहीं होता था, इसलिए वह गंगा नदी तैरकर पार करते थे। आगे चलकर यही बच्चा देश का प्रधानमंत्री बना और 1965 के युद्ध के दौरान भारत का नेतृत्व किया।
2 अक्टूबर को महात्मा गांधी जयंती के साथ लाल बहादुर शास्त्री की जयंती भी मनाई जाती है। वर्ष 1904 में मुगलसराय, वर्तमान पंडित दीनदयाल उपाध्याय नगर में जन्मे शास्त्री का शुरुआती जीवन आर्थिक कठिनाइयों के बीच बीता। उनके पिता शारदा प्रसाद श्रीवास्तव शिक्षक थे और शास्त्री जी के करीब डेढ़ वर्ष के होने पर उनका निधन हो गया था। इसके बाद उनकी मां रामदुलारी देवी ने परिवार संभाला।
नाव का किराया नहीं था, इसलिए गंगा तैरकर जाते थे स्कूल
शास्त्री जी के बचपन से जुड़ा सबसे चर्चित प्रसंग उनकी पढ़ाई से जुड़ा है। स्कूल पहुंचने के लिए उन्हें गंगा नदी पार करनी पड़ती थी। परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि रोज नाव का किराया दिया जा सके। ऐसे में उन्होंने नदी तैरकर पार करने का रास्ता अपनाया।
कई स्रोतों में उल्लेख मिलता है कि वह किताब-कापियां सिर के ऊपर रखकर गंगा पार करते थे, ताकि पढ़ाई का सामान पानी से भीगने से बचा रहे। उनके जीवन का यह प्रसंग बताता है कि आर्थिक मुश्किलों के बावजूद पढ़ाई के प्रति उनका संकल्प कितना मजबूत था।
काशी विद्यापीठ से मिली 'शास्त्री' की उपाधि
शास्त्री जी ने आगे की पढ़ाई जारी रखी और काशी विद्यापीठ से शिक्षा प्राप्त की। वर्ष 1925 में उन्हें 'शास्त्री' की उपाधि मिली। बाद में यही उनकी पहचान का हिस्सा बन गई। उन्होंने अपने नाम से 'श्रीवास्तव' उपनाम हटा दिया था।
गांधी के विचारों से प्रभावित होकर स्वतंत्रता आंदोलन में उतरे
लाल बहादुर शास्त्री महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित थे। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की। असहयोग आंदोलन, नमक सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भी वह आंदोलन से जुड़े रहे। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा और कुल मिलाकर करीब नौ वर्ष जेल में बिताए।
जेल के दौरान भी उन्होंने पढ़ना जारी रखा। उन्होंने पश्चिमी दर्शन और समाजशास्त्र से जुड़ी किताबों का अध्ययन किया। स्वतंत्रता आंदोलन के बाद वह कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में शामिल हुए और धीरे-धीरे राष्ट्रीय राजनीति में उनकी भूमिका बढ़ती गई।
रेल हादसे के बाद रेल मंत्री पद से दिया इस्तीफा
आजादी के बाद शास्त्री जी उत्तर प्रदेश सरकार में गृह और परिवहन मंत्री रहे। बाद में उन्हें जवाहरलाल नेहरू की सरकार में रेल मंत्री की जिम्मेदारी मिली।
उनके रेल मंत्री रहते एक बड़ी रेल दुर्घटना हुई। हादसे की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने रेल मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। यह घटना भारतीय राजनीति में उनके सार्वजनिक जीवन और जवाबदेही से जुड़े प्रमुख प्रसंगों में गिनी जाती है।
1964 में बने देश के दूसरे प्रधानमंत्री
जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद 9 जून 1964 को लाल बहादुर शास्त्री ने प्रधानमंत्री पद संभाला। उनका कार्यकाल करीब 18 महीने का रहा, लेकिन इस दौरान देश को कई बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
वर्ष 1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान उन्होंने देश का नेतृत्व किया। इसी दौर में उनका दिया नारा 'जय जवान, जय किसान' देशभर में लोकप्रिय हुआ। खाद्यान्न संकट के बीच उन्होंने लोगों से एक समय का भोजन छोड़ने की अपील भी की थी और इसकी शुरुआत अपने परिवार से की थी।
प्रधानमंत्री रहते भी लिया था कार के लिए लोन
शास्त्री जी की सादगी से जुड़ा एक और प्रसंग उनकी कार से जुड़ा है। परिवार के लिए कार खरीदने की जरूरत पड़ी तो उनके पास पूरी रकम नहीं थी। उपलब्ध विवरणों के अनुसार कार की कीमत करीब 12 हजार रुपये थी, जबकि उनके पास 7 हजार रुपये थे। उन्होंने पंजाब नेशनल बैंक से 5 हजार रुपये का लोन लिया था।
शास्त्री जी के निधन के बाद इस लोन की बकाया राशि उनकी पत्नी ललिता शास्त्री ने अपनी पेंशन से चुकाई थी। उनकी कार को आज भी उनके स्मारक से जुड़े संग्रह में संरक्षित बताया जाता है।
ताशकंद में हुआ निधन
11 जनवरी 1966 को ताशकंद समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद लाल बहादुर शास्त्री का निधन हो गया। उनकी आधिकारिक मृत्यु का कारण दिल का दौरा बताया गया था। हालांकि, उनकी मृत्यु की परिस्थितियों को लेकर लंबे समय से सार्वजनिक बहस और सवाल उठते रहे हैं।
गरीबी में बीता बचपन, पढ़ाई के लिए गंगा पार करने का संघर्ष, स्वतंत्रता आंदोलन में भागीदारी, मंत्री पद पर रहते हुए नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करना और प्रधानमंत्री के रूप में देश का नेतृत्व करना—लाल बहादुर शास्त्री का जीवन भारतीय इतिहास का ऐसा अध्याय है, जिसमें सादगी और सार्वजनिक जीवन के कई महत्वपूर्ण प्रसंग एक साथ दिखाई देते हैं।