US Citizenship छोड़ भारत की मिट्टी चुनी! वजह जानकर हर भारतीय होगा गर्व से भावुक
आंध्र प्रदेश के नेल्लोर जिले का छोटा-सा गांव कोंड्रगुंटा। सुबह के चार बजे हैं। गांव अभी नींद में है, लेकिन एक कच्चे घर का आंगन जाग चुका है। 94 साल की महालक्ष्मम्मा हाथ में झाड़ू लेकर अपने आंगन को बुहार रही हैं। झाड़ू खत्म होते ही वह तुलसी के चौरे पर जल चढ़ाती हैं और कुछ देर चुपचाप उसे निहारती रहती हैं।
यही उनका रोज का क्रम है। उम्र ने शरीर को कमजोर जरूर किया है, लेकिन अपनी मिट्टी से उनका रिश्ता आज भी उतना ही मजबूत है, जितना नौ दशक पहले था।
महालक्ष्मम्मा का जन्म वर्ष 1932 में इसी गांव में हुआ था। उस दौर में गांव में स्कूल नहीं था, इसलिए वह कभी पढ़-लिख नहीं सकीं। कम उम्र में शादी हुई और कुछ ही वर्षों बाद जीवन ने ऐसी परीक्षा ली, जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी।
साल 1965 में पति का निधन हो गया। पांच छोटे-छोटे बच्चों की जिम्मेदारी अचानक उनके कंधों पर आ गई। घर में सिर्फ दो एकड़ जमीन थी और आमदनी लगभग नहीं के बराबर।
लोगों ने सलाह दी कि बच्चों को रिश्तेदारों के यहां भेज दो या अनाथालय में छोड़ दो। लेकिन महालक्ष्मम्मा ने हार मानने से इनकार कर दिया।
उन्होंने दिन में खेतों में मजदूरी की, रात में चरखा चलाया और हर रुपये को बच्चों की पढ़ाई पर खर्च किया। खुद एक ही साड़ी वर्षों तक पहनती रहीं, लेकिन बच्चों की फीस कभी नहीं रुकने दी।
समय बीतता गया और उनकी मेहनत रंग लाई। तीन बेटे इंजीनियर बने, एक बेटी शिक्षिका बनी और एक बेटा भारतीय सेना में भर्ती हुआ। आज उनके पोते-पोतियां डॉक्टर, सॉफ्टवेयर इंजीनियर और चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं। परिवार देश और विदेश में अपनी पहचान बना चुका है।
लेकिन महालक्ष्मम्मा वहीं रहीं, जहां से उन्होंने जीवन की शुरुआत की थी।
साल 2005 के बाद जब सभी बच्चे अपने-अपने काम के सिलसिले में शहरों और विदेशों में बस गए, तब भी उन्होंने गांव छोड़ने से इनकार कर दिया।
बेटे अक्सर कहते, "अम्मा, हमारे साथ चलो। शहर में सारी सुविधाएं हैं।"
महालक्ष्मम्मा मुस्कुराकर जवाब देतीं, "तुम्हारे फ्लैट में एसी होगा, लेकिन मेरी तुलसी नहीं होगी। मेरा पीपल नहीं होगा। मुझे तो इसी मिट्टी में सुकून मिलता है।"
इसी बीच उनका सबसे बड़ा पोता, जो अमेरिका में सॉफ्टवेयर इंजीनियर है, ने उनकी बेहतर देखभाल के लिए उन्हें अमेरिका बुलाने की प्रक्रिया शुरू की। नियमों के अनुसार उन्हें ग्रीन कार्ड और आगे चलकर अमेरिकी नागरिकता मिलने का रास्ता खुल गया।
लेकिन जब उनसे पूछा गया कि क्या अब वह हमेशा के लिए अमेरिका चली जाएंगी, तो उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के जवाब दिया—
"जाऊंगी तो सिर्फ कुछ दिनों के लिए। अपने पोते के साथ रहूंगी, उसे अपने हाथ की इडली और डोसा बनाना सिखाऊंगी... फिर वापस आ जाऊंगी। मेरी जिंदगी यहीं है। मेरी मिट्टी मेरा इंतजार कर रही है।"
हाल ही में उन्होंने अमेरिकी नागरिकता का त्याग (Renunciation) करने की प्रक्रिया शुरू कर दी, ताकि जीवन का बाकी समय अपने पैतृक गांव में ही बिता सकें।
उनकी एक ही इच्छा है—जब जीवन की अंतिम यात्रा पूरी हो, तो उनकी अर्थी भी इसी गांव की गलियों से निकले और अंतिम संस्कार भी उसी मिट्टी में हो, जहां उन्होंने जन्म लिया, संघर्ष किया और अपने बच्चों का भविष्य बनाया।
महालक्ष्मम्मा की कहानी सिर्फ एक बुजुर्ग महिला की कहानी नहीं है। यह उस रिश्ते की कहानी है, जिसे न पासपोर्ट बदल सकता है, न सीमाएं और न ही नागरिकता।
विदेश की चमक अपनी जगह है, लेकिन कुछ लोगों के लिए सबसे बड़ी पहचान उनके गांव की वह मिट्टी होती है, जिसने उन्हें जीना सिखाया।