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संसद में विपक्ष का बड़ा कदम: लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस, 118 सांसदों ने दिए हस्ताक्षर
 

 

नई दिल्ली I संसद के बजट सत्र में जारी हंगामे और गतिरोध के बीच विपक्ष ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। मंगलवार को विपक्षी दलों ने लोकसभा सचिवालय में स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस सौंप दिया। यह नोटिस संविधान के अनुच्छेद 94(सी) के तहत दिया गया है, जिसके तहत स्पीकर को हटाने की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है।

कांग्रेस सांसद गौराव गोगोई ने बताया कि दोपहर 1:14 बजे लोकसभा महासचिव को यह नोटिस सौंपा गया। नोटिस पर विपक्ष के 118 सांसदों के हस्ताक्षर हैं, जिसमें कांग्रेस, डीएमके, समाजवादी पार्टी (सपा), वाम दल और अन्य विपक्षी दल शामिल हैं। हालांकि, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के सांसदों ने इस नोटिस पर हस्ताक्षर नहीं किए और वे इस प्रस्ताव का हिस्सा नहीं हैं।

विपक्ष का मुख्य आरोप है कि स्पीकर ओम बिरला लगातार पक्षपाती व्यवहार कर रहे हैं और विपक्षी सांसदों को जनहित के महत्वपूर्ण मुद्दे उठाने से रोक रहे हैं। नोटिस में कहा गया है कि स्पीकर सदन की कार्यवाही को खुलेआम एकतरफा तरीके से संचालित कर रहे हैं। कई मौकों पर विपक्षी दलों के नेताओं को बोलने की अनुमति नहीं दी गई, जो उनका मौलिक लोकतांत्रिक अधिकार है। इसके अलावा, आठ विपक्षी सांसदों को मनमाने ढंग से निलंबित किया गया है, जिन्हें केवल अपने अधिकारों का प्रयोग करने के लिए दंडित किया जा रहा है।

यह विवाद मुख्य रूप से 2 फरवरी को लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की चर्चा के दौरान शुरू हुआ, जब राहुल गांधी ने पूर्व सेना प्रमुख की किताब में कथित टिप्पणियों के आधार पर सरकार पर हमला बोला। विपक्ष का आरोप है कि स्पीकर ने सरकार के दबाव में राहुल गांधी को बोलने नहीं दिया। इसके बाद 4 फरवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संबोधन निर्धारित था, लेकिन इसे रद्द कर दिया गया। स्पीकर ने 5 फरवरी को कहा कि कई विपक्षी सांसदों का व्यवहार उग्र था और लोकतांत्रिक गरिमा के अनुरूप नहीं था, इसलिए पीएम की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उनका संबोधन टाला गया।

विपक्ष ने स्पीकर के इस बयान को खारिज करते हुए कड़ी आपत्ति जताई और उन्हें पत्र लिखकर पक्षपात का आरोप लगाया। कांग्रेस के चीफ व्हिप के. सुरेश सहित अन्य नेताओं ने इस नोटिस को सौंपा।

लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने नोटिस मिलने के बाद महासचिव को निर्देश दिया है कि इसे जांचें और नियमों के अनुसार शीघ्र कार्रवाई करें। यह कदम संसदीय इतिहास में दुर्लभ है और बजट सत्र में राजनीतिक तनाव को और बढ़ा सकता है।