पाकिस्तान 2027 में IMF-वर्ल्ड बैंक की अध्यक्षता करेगा, लेकिन क्या उसके पास कोई खास ताकत होगी? भारत के पूर्व IMF डायरेक्टर का तंज
पाकिस्तान को 2027 में IMF और विश्व बैंक के शासी मंडल की अध्यक्षता मिलेगी। सरकार ने इसे ऐतिहासिक उपलब्धि बताया है, लेकिन भारत के पूर्व IMF निदेशक कृष्णमूर्ति सुब्रमण्यन ने इसे औपचारिक जिम्मेदारी करार दिया। जानिए इस पद की वास्तविक भूमिका क्या है और भारत की G20 अध्यक्षता से इसकी तुलना क्यों गलत है।
पाकिस्तान को साल 2027 के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक समूह के शासी मंडल की अध्यक्षता मिलने वाली है। पाकिस्तान सरकार ने इसे ऐतिहासिक उपलब्धि बताया है, लेकिन भारत के पूर्व IMF कार्यकारी निदेशक कृष्णमूर्ति वी. सुब्रमण्यन ने इस दावे पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि यह पद मुख्य रूप से औपचारिक है और इससे कर्ज देने के फैसलों पर नियंत्रण नहीं मिलता।
पाकिस्तान को 74 साल बाद मिली यह जिम्मेदारी
पाकिस्तान के आर्थिक मामलों के मंत्री अहद खान चीमा को बैंकॉक में आयोजित 2026 की IMF-वर्ल्ड बैंक वार्षिक बैठकों के दौरान साल 2027 के लिए अगला अध्यक्ष घोषित किया गया। पाकिस्तान के आर्थिक मामलों के मंत्रालय के मुताबिक, देश को 1953 के बाद पहली बार यह जिम्मेदारी मिलने जा रही है।
पाकिस्तान सरकार ने इस नियुक्ति को वैश्विक आर्थिक मंच पर देश की अहम भूमिका के तौर पर पेश किया है। उसका कहना है कि इस जिम्मेदारी से उसे आर्थिक और विकास से जुड़े अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा में योगदान देने और सदस्य देशों के बीच संवाद बढ़ाने का अवसर मिलेगा। हालांकि, इस नियुक्ति का वास्तविक महत्व कितना है, इसी पर अब चर्चा शुरू हो गई है।
‘प्रोटोकॉल है, पावर नहीं’, कृष्णमूर्ति सुब्रमण्यन ने क्या कहा?
IMF में भारत के पूर्व कार्यकारी निदेशक कृष्णमूर्ति वी. सुब्रमण्यन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पाकिस्तान के दावे पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि IMF और विश्व बैंक के शासी मंडल की वार्षिक बैठक की अध्यक्षता एक औपचारिक जिम्मेदारी है, जो सदस्य देशों के बीच बारी-बारी से मिलती है।
उन्होंने इसे ‘प्रोटोकॉल, पावर नहीं’ बताते हुए कहा कि पाकिस्तान की इस भूमिका को वैश्विक वित्तीय नेतृत्व में बड़ी वापसी के रूप में पेश करना सही तस्वीर नहीं दिखाता। सुब्रमण्यन के मुताबिक, इस पद का मुख्य काम वार्षिक बैठक की अध्यक्षता करना है। इससे पाकिस्तान को IMF के कर्ज देने के फैसलों पर विशेष नियंत्रण नहीं मिल जाता।
भारत की G20 और BRICS अध्यक्षता से तुलना क्यों गलत?
सुब्रमण्यन ने पाकिस्तान की नई भूमिका की तुलना भारत की G20 और BRICS अध्यक्षता से किए जाने पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने इसे दोनों स्थितियों की गलत तुलना बताया।
उनके अनुसार, भारत की G20 अध्यक्षता के दौरान वैश्विक आर्थिक सहयोग से जुड़े प्रमुख मुद्दों के एजेंडे को आगे बढ़ाने का अवसर मिला था। वहीं, BRICS की अध्यक्षता ने उभरती अर्थव्यवस्थाओं के मंच पर सहयोग और संवाद को आगे बढ़ाने में भूमिका निभाई।
इसके मुकाबले पाकिस्तान को मिलने वाली जिम्मेदारी IMF-वर्ल्ड बैंक की वार्षिक बैठक की अध्यक्षता तक सीमित है। इसलिए दोनों भूमिकाओं को समान स्तर की उपलब्धि बताना उचित नहीं होगा।
IMF से कर्ज ले रहा है पाकिस्तान
पाकिस्तान को यह जिम्मेदारी ऐसे समय मिली है, जब उसकी अर्थव्यवस्था को बाहरी वित्तीय सहायता की जरूरत बनी हुई है। देश IMF के 7 अरब डॉलर के एक्सटेंडेड फंड फैसिलिटी (EFF) कार्यक्रम के तहत सहायता ले रहा है। इसके अलावा, जलवायु संबंधी जोखिमों और अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिए 1.4 अरब डॉलर की रेजिलिएंस एंड सस्टेनेबिलिटी फैसिलिटी (RSF) भी है।
IMF और पाकिस्तानी अधिकारियों के बीच हालिया समीक्षा पर स्टाफ-स्तर का समझौता हुआ है। इसके बाद करीब 1.2 अरब डॉलर की अगली सहायता मिलने की उम्मीद है, लेकिन इसके लिए IMF के कार्यकारी बोर्ड की मंजूरी जरूरी है।
यही वजह है कि पाकिस्तान की अध्यक्षता को लेकर एक तरफ सरकार इसे कूटनीतिक उपलब्धि बता रही है, तो दूसरी तरफ विशेषज्ञ इस बात पर जोर दे रहे हैं कि औपचारिक पद और वास्तविक वित्तीय अधिकार अलग-अलग चीजें हैं।
निष्कर्ष: पाकिस्तान को 2027 में IMF-वर्ल्ड बैंक के शासी मंडल की वार्षिक बैठक की अध्यक्षता मिलेगी। यह उसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी बात रखने का अवसर जरूर देती है, लेकिन इससे कर्ज देने की नीतियों या फैसलों पर विशेष अधिकार नहीं मिलते। कृष्णमूर्ति सुब्रमण्यन की टिप्पणी इसी अंतर को रेखांकित करती है।