रिकॉर्ड तोड़ गर्मी, कमजोर मानसून और बीमारियों का खतरा…150 साल बाद लौट रहा ‘मेगा अल नीनो’!
Updated: Apr 26, 2026, 20:40 IST
दुनिया इस समय प्रकृति के एक बेहद खतरनाक बदलाव की दहलीज पर खड़ी है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि ‘मेगा अल नीनो’ की वापसी के संकेत मिल रहे हैं, जो पिछले करीब 150 सालों में सबसे गंभीर स्थिति मानी जा रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह बदलाव वैश्विक मौसम प्रणाली को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है और इसके असर से कई देशों में भीषण गर्मी, सूखा, बाढ़ और खाद्य संकट जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं।
क्या होता है अल नीनो?
El Niño एक प्राकृतिक जलवायु प्रक्रिया है, जिसमें प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है। इसका असर पूरी दुनिया के मौसम पर पड़ता है।
जब समुद्र का तापमान तेजी से बढ़ता है, तो बारिश, हवाओं और तापमान का संतुलन बिगड़ जाता है। इस बार वैज्ञानिक इसे “मेगा अल नीनो” कह रहे हैं, क्योंकि इसकी तीव्रता बेहद ज्यादा मानी जा रही है।
ग्लोबल वार्मिंग ने बढ़ाया खतरा
विशेषज्ञों का मानना है कि Global Warming ने इस स्थिति को और खतरनाक बना दिया है।
बढ़ते तापमान की वजह से समुद्र पहले से ज्यादा गर्म हो रहे हैं, जिससे अल नीनो का असर अधिक गंभीर हो सकता है।
दुनिया में बढ़ सकती है भीषण गर्मी
मेगा अल नीनो के कारण दुनिया के कई हिस्सों में रिकॉर्ड तोड़ गर्मी पड़ने की आशंका जताई जा रही है। इसका सीधा असर खेती और खाद्य उत्पादन पर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार:
फसलों की पैदावार घट सकती है
अनाज की कमी हो सकती है
महंगाई बढ़ सकती है
पानी का संकट गहरा सकता है
बीमारियों का भी बढ़ेगा खतरा
गर्म और नम मौसम Dengue और Cholera जैसी बीमारियों के फैलने के लिए अनुकूल माना जाता है।
इसके अलावा समुद्र का तापमान बढ़ने से मछलियों और समुद्री जीवों पर भी गंभीर असर पड़ सकता है, जिससे इकोसिस्टम असंतुलित होने का खतरा बढ़ जाएगा।
भारत के लिए क्यों बड़ी चुनौती?
भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए मेगा अल नीनो बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि इसके कारण मानसून कमजोर पड़ सकता है, जिससे खेती प्रभावित होगी और किसानों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अगर जलवायु परिवर्तन को लेकर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले साल मानवता के लिए बेहद कठिन साबित हो सकते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह बदलाव वैश्विक मौसम प्रणाली को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है और इसके असर से कई देशों में भीषण गर्मी, सूखा, बाढ़ और खाद्य संकट जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं।
क्या होता है अल नीनो?
El Niño एक प्राकृतिक जलवायु प्रक्रिया है, जिसमें प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है। इसका असर पूरी दुनिया के मौसम पर पड़ता है।
जब समुद्र का तापमान तेजी से बढ़ता है, तो बारिश, हवाओं और तापमान का संतुलन बिगड़ जाता है। इस बार वैज्ञानिक इसे “मेगा अल नीनो” कह रहे हैं, क्योंकि इसकी तीव्रता बेहद ज्यादा मानी जा रही है।
ग्लोबल वार्मिंग ने बढ़ाया खतरा
विशेषज्ञों का मानना है कि Global Warming ने इस स्थिति को और खतरनाक बना दिया है।
बढ़ते तापमान की वजह से समुद्र पहले से ज्यादा गर्म हो रहे हैं, जिससे अल नीनो का असर अधिक गंभीर हो सकता है।
दुनिया में बढ़ सकती है भीषण गर्मी
मेगा अल नीनो के कारण दुनिया के कई हिस्सों में रिकॉर्ड तोड़ गर्मी पड़ने की आशंका जताई जा रही है। इसका सीधा असर खेती और खाद्य उत्पादन पर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार:
फसलों की पैदावार घट सकती है
अनाज की कमी हो सकती है
महंगाई बढ़ सकती है
पानी का संकट गहरा सकता है
बीमारियों का भी बढ़ेगा खतरा
गर्म और नम मौसम Dengue और Cholera जैसी बीमारियों के फैलने के लिए अनुकूल माना जाता है।
इसके अलावा समुद्र का तापमान बढ़ने से मछलियों और समुद्री जीवों पर भी गंभीर असर पड़ सकता है, जिससे इकोसिस्टम असंतुलित होने का खतरा बढ़ जाएगा।
भारत के लिए क्यों बड़ी चुनौती?
भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए मेगा अल नीनो बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि इसके कारण मानसून कमजोर पड़ सकता है, जिससे खेती प्रभावित होगी और किसानों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अगर जलवायु परिवर्तन को लेकर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले साल मानवता के लिए बेहद कठिन साबित हो सकते हैं।