रुपया कमजोर, तेल महंगा… अब PM मोदी ने क्यों कहा- गोल्ड खरीदना रोक दें?
New Delhi : नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से एक साल पहले की एक रैली के दौरान सिकंदराबाद में एक रैली का आयोजन किया था, जिसमें उन्होंने आर्थिक और लोकतांत्रिक बहस की अपील की थी। प्रधानमंत्री ने कहा कि देश की एकमात्र सीमा जान तक सीमित नहीं है, बल्कि कठिन समय में जिम्मेदारी से जीना भी जरूरी है।
क्यों की गई यह अपील?
ईरान युद्ध, बढ़ती कच्चे तेल की कीमतों और कमजोर होते रुपये के बीच भारत पर विदेशी मुद्रा का दबाव बढ़ रहा है। ऐसे में प्रधानमंत्री की यह अपील देश से बाहर जाने वाले डॉलर को कम करने की कोशिश के तौर पर देखी जा रही है।
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गोल्ड इम्पोर्टर है। देश में हर साल करीब 700-800 टन सोने की खपत होती है, जबकि घरेलू उत्पादन केवल 1-2 टन के आसपास है। यानी भारत अपनी जरूरत का लगभग 90 फीसदी सोना आयात करता है।
कितना खर्च होता है गोल्ड इम्पोर्ट पर?
वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का गोल्ड इम्पोर्ट करीब 72 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो पिछले वित्त वर्ष के मुकाबले लगभग 24 फीसदी ज्यादा है। सोने का भुगतान डॉलर में होता है, इसलिए इसका सीधा असर देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ता है।
Reserve Bank of India के आंकड़ों के अनुसार, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार फरवरी 2026 में 728 अरब डॉलर तक पहुंचा था, लेकिन वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच अप्रैल में यह घटकर करीब 691 अरब डॉलर रह गया।
एक साल सोना न खरीदने से क्या होगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर भारत में सोने के आयात में 30-40 फीसदी तक कमी आती है, तो देश करीब 20-25 अरब डॉलर बचा सकता है। वहीं, यदि आयात आधा हो जाए तो करीब 36 अरब डॉलर की बचत संभव है।
यह नेट भारत के बढ़ते चालू खाते को कम करने में बड़ी भूमिका निभा सकता है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुमान के अनुसार 2026 में भारत का चालू खाता घाटा 84.5 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है।
क्या हैं इसके बड़े मायने?
आर्थिक जानकारों के मुताबिक, अगर लोग कुछ समय तक सोने की खरीदारी कम करें तो इससे:
- डॉलर की मांग घटेगी
- रुपये पर दबाव कम होगा
- विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत रहेगा
- आयात बिल में कमी आएगी
सरकार और आर्थिक विशेषज्ञ इसे मौजूदा वैश्विक संकट के बीच “आर्थिक राष्ट्रहित” से जोड़कर देख रहे हैं।