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सबरीमाला सुनवाई में जस्टिस नागरत्ना की बड़ी टिप्पणी, बोलीं— ‘महावारी को छुआछूत नहीं मान सकते’

 

New Delhi : सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में अहम बहस देखने को मिली। मंगलवार को सुनवाई के दौरान जस्टिस बी. वी. नागरत्ना ने महावारी को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की और इसे छुआछूत से जोड़ने पर सवाल उठाए।

महावारी को छुआछूत नहीं मान सकते— जस्टिस नागरत्ना

सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि यह स्वीकार्य नहीं हो सकता कि हर महीने कुछ दिनों तक महिला को छुआछूत माना जाए और बाद में नहीं। उन्होंने कहा कि एक महिला के तौर पर मैं कह सकती हूं कि ऐसा नहीं होना चाहिए कि तीन दिन छुआछूत माना जाए और चौथे दिन खत्म हो जाए। उन्होंने यह भी जोड़ा कि संविधान का अनुच्छेद 17 छुआछूत को समाप्त करने की बात करता है।

केंद्र ने पितृसत्ता की अवधारणा पर उठाए सवाल

केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पितृसत्तात्मक समाज की अवधारणा पर ही सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि भारत में महिलाओं को उच्च स्थान दिया जाता है और पितृसत्ता का तर्क हर मामले में लागू करना उचित नहीं है।

उन्होंने यह भी कहा कि संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 सभी को समान अधिकार देते हैं और मंदिर प्रवेश से जुड़े पुराने फैसलों में भेदभाव का मुद्दा जाति आधारित था, न कि लैंगिक।

‘यह आस्था का विषय, भेदभाव नहीं’

तुषार मेहता ने दलील दी कि सबरीमाला मंदिर का मामला लैंगिक भेदभाव का नहीं, बल्कि धार्मिक मान्यता का है। उन्होंने कहा कि यहां हर महीने के कुछ दिनों का प्रतिबंध नहीं, बल्कि एक विशेष आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर परंपरागत रोक है।

इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ कर रही है। यह मामला लंबे समय से देशभर में बहस का विषय रहा है, जिसमें धार्मिक परंपराओं और समानता के अधिकार के बीच संतुलन पर चर्चा जारी है।