रेलवे के 'सेकेंड क्लास पैसेंजर' शब्द पर SC नाराज, पीड़ित परिवार को मिलेगा ₹8 लाख मुआवजा
नई दिल्ली। रेलवे दुर्घटनाओं में पीड़ितों और उनके परिवारों के अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि ट्रेन हादसे में किसी यात्री की मौत होने पर केवल इसलिए मुआवजा देने से इनकार नहीं किया जा सकता कि मृतक के पास टिकट नहीं मिला। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रेलवे एक्ट एक कल्याणकारी कानून है और इसकी व्याख्या तकनीकी या प्रतिबंधात्मक तरीके से नहीं, बल्कि उद्देश्यपूर्ण और उदार तरीके से की जानी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने ट्रेन से गिरकर हुई मौत के एक मामले में रेलवे दावा ट्रिब्युनल और हाई कोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए मृतक के परिवार को 8 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है। कोर्ट ने रेलवे को चार हफ्ते के भीतर मुआवजा देने को कहा है। देरी होने पर 8 फीसदी सालाना ब्याज भी देना होगा।
यह फैसला न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने सुनाया। मामले में 2015 में एक व्यक्ति की ट्रेन से गिरकर मौत हो गई थी। उसकी पत्नी लता ने रेलवे दावा ट्रिब्युनल में मुआवजे के लिए दावा किया था, लेकिन मृतक के पास टिकट नहीं मिलने के आधार पर दावा खारिज कर दिया गया। हाई कोर्ट ने भी ट्रिब्युनल के फैसले को बरकरार रखा था। इसके बाद महिला ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
फैसला सुनाते हुए पीठ ने कहा कि रेलवे अधिनियम की धारा 124ए के तहत मुआवजा दोषरहित दायित्व के सिद्धांत पर आधारित है। इसका उद्देश्य रेलवे दुर्घटनाओं के पीड़ितों को बिना लापरवाही साबित किए शीघ्र मुआवजा उपलब्ध कराना है। कोर्ट ने कहा कि केवल टिकट नहीं मिलने से किसी मृतक यात्री की वास्तविक यात्री होने की स्थिति खत्म नहीं हो जाती।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि शुरुआती तौर पर दावेदार की जिम्मेदारी हलफनामे के जरिए पूरी की जा सकती है। इस मामले में मृतक की पत्नी ने हलफनामा देकर बताया था कि टिकट मृतक के बैग में था, जो हादसे के बाद नहीं मिला।
कोर्ट ने रेलवे मैनुअल का भी हवाला दिया। फैसले में कहा गया कि रेलवे के नियमों के मुताबिक यात्री का टिकट तीन जगह चेक किया जाता है। अगर नियमों का पालन किया गया होता तो यात्री के ट्रेन में चढ़ने से पहले ही टिकट की जांच हो जाती और उसका रिकॉर्ड मौजूद होता।
सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे की कार्यप्रणाली और यात्री सुरक्षा को लेकर भी अहम टिप्पणियां कीं। कोर्ट ने रेलवे मैनुअल में इस्तेमाल किए गए 'सेकेंड क्लास पैसेंजर' शब्द पर आपत्ति जताई और कहा कि श्रेणी का संबंध यात्री से नहीं, बल्कि कोच से होना चाहिए। पीठ ने कहा कि भारत में श्रेणी आधारित भेदभाव का इतिहास रहा है और इस तरह का वर्गीकरण संविधान की भावना के खिलाफ और अपमानजनक हो सकता है।
फैसले में रेलवे में भीड़भाड़ और यात्रियों की सुरक्षा का मुद्दा भी उठाया गया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रेलवे को सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के लिए अधिक कर्मचारियों की जरूरत होगी। कोर्ट ने सुझाव दिया कि युवाओं को रोजगार देकर रेलवे में कर्मचारियों की संख्या बढ़ाई जा सकती है। इससे न सिर्फ रोजगार मिलेगा, बल्कि यात्रियों की जान बचाने में भी मदद मिलेगी।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि तकनीकी खामियों और प्रक्रिया संबंधी कमियों के आधार पर कल्याणकारी कानून के उद्देश्य को विफल नहीं किया जा सकता।