शुरुआत में ही खारिज होनी चाहिए थी : सबरीमाला याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणी
New Delhi : सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने याचिका दायर करने वाली संस्था पर कड़े सवाल उठाए हैं। 9 जजों की संविधान पीठ ने याचिका के आधार, प्रक्रिया और विश्वसनीयता पर गंभीर टिप्पणियां कीं।
‘याचिका का आधार समझ से परे’
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि याचिका दाखिल करते समय भारतीय युवा अधिवक्ता संघ (IYLA) के अध्यक्ष नौशाद अली थे और मंदिर के नियमों में उनकी रुचि “समझ से परे” है। कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि क्या संस्था ने याचिका दायर करने से पहले कोई औपचारिक निर्णय लिया था।
पीठ की सदस्य जस्टिस बी. वी. नागरत्ना ने मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर दाखिल जनहित याचिकाओं (PIL) की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि कई बार खबरें केवल PIL दाखिल करने के उद्देश्य से प्रकाशित कराई जाती हैं। उन्होंने टिप्पणी की कि अब PIL “पब्लिसिटी या पॉलिटिकल इंटरेस्ट लिटिगेशन” में बदलती जा रही हैं।
CJI की सख्त टिप्पणी
पीठ की अध्यक्षता कर रहे Justice सूर्यकांत ने 2006 में दाखिल याचिका को लेकर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि इसे “शुरुआत में ही खारिज कर देना चाहिए था।” उन्होंने यह भी कहा कि मंदिर नियमों के खिलाफ जबरन प्रवेश की कोशिश “व्यक्तिगत दुराचार” (Individual Misconduct) थी, जिस पर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए थी।
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एम. एम. सुंदरेश ने याचिका दायर करने की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए इसे “कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग” बताया। कोर्ट ने पूछा कि क्या याचिका दाखिल करने से पहले संस्था में कोई औपचारिक बैठक या प्रस्ताव पारित किया गया था।
पूर्व CJI पर भी टिप्पणी
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने पूर्व CJI दीपक मिश्रा के आदेशों का हवाला दिया, जिस पर जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि “वकीलों को सुरक्षा देने के बजाय याचिका खारिज कर दी जानी चाहिए थी।”
सुप्रीम कोर्ट की इन टिप्पणियों से साफ है कि अदालत अब PIL के दुरुपयोग को लेकर सख्त रुख अपनाए हुए है। सबरीमाला मामले में यह सुनवाई न सिर्फ धार्मिक स्वतंत्रता बनाम मौलिक अधिकारों की बहस को प्रभावित कर सकती है, बल्कि भविष्य में PIL दाखिल करने के मानकों को भी कड़ा बना सकती है।