पुरानी गाड़ियों के लिए E10 पेट्रोल फिर उपलब्ध कराने का सुझाव, CEA ने बताई वजह
नई दिल्ली। भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) वी. अनंत नागेश्वरन ने पुरानी गाड़ियों के लिए E10 पेट्रोल फिर से उपलब्ध कराने का सुझाव दिया है। उनका कहना है कि नई गाड़ियों के लिए E20 पेट्रोल जारी रखते हुए उन पुराने वाहनों के मालिकों को E10 खरीदने का विकल्प दिया जाना चाहिए, जो कम एथनॉल मिश्रण के लिए डिजाइन किए गए हैं।
नागेश्वरन और उनके सह-लेखक आकाश पुजारी ने द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक लेख में यह सुझाव दिया है। उन्होंने कहा कि भारत के बड़े एथनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम के साथ पुरानी गाड़ियों के लिए अलग व्यवस्था की जरूरत है।
7.5 से 8 करोड़ दोपहिया वाहनों पर असर की चिंता
CEA के मुताबिक भारत में करीब 7.5 से 8 करोड़ दोपहिया वाहन ऐसे हैं, जिन्हें E10 के लिए डिजाइन किया गया था। इनमें से कई वाहन ज्यादा एथनॉल वाले मिश्रण के लिए तैयार नहीं किए गए हैं।
उन्होंने कहा कि समस्या सिर्फ माइलेज कम होने तक सीमित नहीं है। पुराने वाहनों के इंजन और फ्यूल सिस्टम में इस्तेमाल होने वाली रबर सील और दूसरे पार्ट्स ज्यादा एथनॉल वाले ईंधन से प्रभावित हो सकते हैं। वहीं, कार्बोरेटर वाले पुराने वाहनों में भी E20 के इस्तेमाल को लेकर तकनीकी दिक्कतें सामने आ सकती हैं।
नागेश्वरन का तर्क है कि पेट्रोल पंपों पर E20 के साथ E10 का विकल्प उपलब्ध कराने से पुराने वाहन मालिकों की चिंता कम होगी और जब तक पुराने वाहनों को धीरे-धीरे बदला या रेट्रोफिट किया जाता है, तब तक उन्हें सुरक्षित तरीके से चलाने में मदद मिल सकती है।
E20 से ऊर्जा में कमी पर भी दी सफाई
मुख्य आर्थिक सलाहकार ने E20 को लेकर किए जा रहे कुछ बढ़े-चढ़े दावों को भी खारिज किया। उन्होंने कहा कि पेट्रोल में एथनॉल की मात्रा 20 प्रतिशत होने के बावजूद ऊर्जा में कमी करीब 6 से 7 प्रतिशत है, न कि 30 प्रतिशत जैसी बड़ी कमी।
हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि पुराने वाहनों में लगी रबर सील जैसी चीजें एक अलग समस्या हो सकती हैं, क्योंकि लंबे समय तक एथनॉल के संपर्क में रहने से इन पर असर पड़ सकता है।
एथनॉल नीति को लेकर बदली बहस
भारत में एथनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम का प्रमुख उद्देश्य आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करना, देश में वैकल्पिक ईंधन को बढ़ावा देना और गन्ना, मक्का समेत अन्य फीडस्टॉक से बनने वाले एथनॉल के लिए घरेलू बाजार तैयार करना है।
हालांकि, पुरानी गाड़ियों के मालिकों के लिए E20 के इस्तेमाल से माइलेज और वाहन के पार्ट्स की लंबी अवधि की विश्वसनीयता को लेकर सवाल बने हुए हैं। नागेश्वरन का कहना है कि नीति बनाते समय इन वाहनों की वास्तविक स्थिति को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि एथनॉल की बढ़ती मांग का असर जमीन, पानी और खाद्य उपलब्धता पर पड़ सकता है। ऐसे में 'भोजन बनाम ईंधन' के सवाल को भी नीति निर्माण में ध्यान में रखना जरूरी है।
एथनॉल इंडस्ट्री ने सुझाव का किया विरोध
CEA के सुझाव पर एथनॉल इंडस्ट्री की ओर से विरोध भी सामने आया है। ऑल इंडिया डिस्टिलर्स एसोसिएशन (AIDA) के उपाध्यक्ष कुशल मित्तल ने कहा कि भारत को किसी नीति को केवल भावनाओं या धारणाओं के आधार पर वापस लेने के बारे में नहीं सोचना चाहिए।
मित्तल के मुताबिक E20 की दिशा में बढ़ने का फैसला जल्दबाजी में नहीं लिया गया था। उन्होंने कहा कि सरकार ने वर्ष 2016 में ही पायलट ट्रायल शुरू किए थे और 2022 में ऑटोमोबाइल कंपनियों के साथ मिलकर इसका व्यापक मूल्यांकन किया गया।
उन्होंने E20 को भारत की ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए रणनीतिक जरूरत बताया। उनका कहना है कि कम ब्लेंडिंग पर वापस जाने के बजाय तकनीकी और परिचालन संबंधी चिंताओं का समाधान किया जाना चाहिए।
राजनीतिक प्रतिक्रिया भी सामने आई
CEA के लेख पर राजनीतिक प्रतिक्रिया भी देखने को मिली। दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लेख साझा करते हुए केंद्र सरकार से इस सुझाव पर ध्यान देने की बात कही।