सुप्रीम कोर्ट का फैसला: कर्मचारी प्रतिकर में देरी की पेनल्टी खुद चुकाएगा एम्प्लॉयर, इंश्योरेंस कंपनी नहीं
नई दिल्ली। Supreme Court of India ने कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम को लेकर अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि मुआवजे में देरी पर लगने वाली पेनल्टी की रकम एम्प्लॉयर को स्वयं अदा करनी होगी, भले ही मूल मुआवजा इंश्योरेंस पॉलिसी के तहत कवर क्यों न हो। कोर्ट ने कहा कि यह कानून कर्मचारियों के हितों की रक्षा के लिए बनाया गया सामाजिक कल्याण कानून है, इसलिए इसकी व्याख्या लाभार्थियों के पक्ष में उदारतापूर्वक की जानी चाहिए।
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पी. बी. वराले की खंडपीठ ने यह निर्णय The New India Assurance Company Limited की याचिका पर सुनाया। कंपनी ने Delhi High Court के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें देरी की पेनल्टी भी इंश्योरेंस कंपनी पर डाल दी गई थी।
कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कई पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम की धारा 4A(3)(b) के तहत पेनल्टी की जिम्मेदारी पूरी तरह एम्प्लॉयर पर ही है। अदालत ने स्पष्ट किया कि मुआवजा और उस पर लगने वाला ब्याज बीमा कंपनी दे सकती है, लेकिन देरी की सजा के रूप में लगाई गई पेनल्टी एम्प्लॉयर को ही भरनी होगी।
कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें पेनल्टी की जिम्मेदारी इंश्योरेंस कंपनी पर डाली गई थी।
कानून के उद्देश्य पर जोर
पीठ ने कहा कि यह अधिनियम संसद द्वारा कर्मचारियों की शिकायतों के त्वरित समाधान और उनके परिवारों को आर्थिक सुरक्षा देने के लिए बनाया गया है। किसी दुर्घटना की स्थिति में कर्मचारी या उसके आश्रितों को शीघ्र मुआवजा मिलना चाहिए, ताकि इलाज या परिवार की आजीविका पर संकट न आए।
क्या है मामला?
मामला फरवरी 2017 का है। एक कर्मचारी की अपने एम्प्लॉयर के वाहन चलाते समय दुर्घटना में मौत हो गई थी। मुआवजा न मिलने पर मृतक के परिजनों ने जुलाई 2017 में लेबर कमिश्नर से गुहार लगाई।
लेबर कमिश्नर ने 7.36 लाख रुपये मुआवजा, 12 प्रतिशत ब्याज और देरी के लिए 35 प्रतिशत पेनल्टी का आदेश दिया। वाहन बीमित होने के कारण मुआवजा राशि इंश्योरेंस कंपनी से वसूली जानी थी, जबकि पेनल्टी एम्प्लॉयर पर लगाई गई थी।
हालांकि, दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि पेनल्टी भी इंश्योरेंस कंपनी को ही चुकानी होगी।
क्यों पलटा गया हाई कोर्ट का फैसला?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 1995 में कानून में संशोधन कर पेनल्टी को मुआवजे और ब्याज से अलग कर दिया गया था। इसका उद्देश्य इंश्योरेंस कंपनियों पर अनावश्यक बोझ कम करना था, क्योंकि पहले पेनल्टी भी उन्हें ही देनी पड़ती थी।
अदालत ने यह भी कहा कि जब पेनल्टी का भार भी बीमा कंपनियों पर चला जाता था, तब एम्प्लॉयर समय पर भुगतान करने को लेकर गंभीर नहीं होते थे। इससे एक महीने की निर्धारित समय-सीमा का महत्व खत्म हो गया था।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से अब एम्प्लॉयरों पर समय पर मुआवजा देने का दबाव बढ़ेगा और कर्मचारियों के परिवारों को त्वरित आर्थिक सहायता मिल सकेगी।