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सबरीमाला सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी, कहा- हर चीज अदालत में आई तो धर्म टूटने लगेंगे

 

New Delhi : सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को सबरीमाला मंदिर और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान अहम टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि यदि हर धार्मिक प्रथा और परंपरा को संवैधानिक अदालतों में चुनौती दी जाने लगेगी, तो इससे धर्मों और भारतीय सभ्यता के विघटन का खतरा पैदा हो सकता है।

नौ जजों की संविधान पीठ कर रही सुनवाई

यह टिप्पणी मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ जजों की संविधान पीठ ने की। पीठ में जस्टिस बी. वी. नागरत्ना, जस्टिस एम. एम. सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची शामिल हैं।

पीठ महिलाओं के धार्मिक स्थलों पर प्रवेश और विभिन्न धर्मों में धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रही है, जिनमें सबरीमाला मंदिर से जुड़ा मामला भी शामिल है।

दाऊदी बोहरा समुदाय की याचिका पर सुनवाई

सुनवाई के दौरान दाऊदी बोहरा समुदाय से जुड़ी एक पुरानी जनहित याचिका पर भी चर्चा हुई। इस याचिका में 1962 के उस फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसमें बॉम्बे बहिष्कार निवारण अधिनियम 1949 को निरस्त किया गया था।

सुधारवादी दाऊदी बोहरा समूह की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने दलील दी कि किसी धार्मिक प्रथा का असर यदि मौलिक अधिकारों पर पड़ता है, तो उसे पूरी तरह संवैधानिक संरक्षण नहीं मिल सकता।

‘हर चीज अदालत में आने लगी तो क्या होगा?’

इस पर जस्टिस बी. वी. नागरत्ना ने कहा कि यदि हर धार्मिक प्रथा को अदालत में चुनौती दी जाने लगेगी, तो मंदिर खोलने-बंद करने जैसे मुद्दों पर सैकड़ों याचिकाएं दायर होने लगेंगी।

उन्होंने कहा कि भारत की पहचान इसकी विविधता और बहुलता है। धर्म भारतीय समाज से गहराई से जुड़ा हुआ है। अगर हर चीज अदालत में आने लगी तो इस सभ्यता का क्या होगा?

‘हर धर्म विघटित हो जाएगा’

जस्टिस एम. एम. सुंदरेश ने भी इस पर सहमति जताते हुए कहा कि अगर हर विवाद अदालत में आने लगा तो हर धर्म विघटित हो जाएगा और संवैधानिक अदालतों को बंद करना पड़ेगा।

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी धार्मिक स्वतंत्रता, संवैधानिक अधिकारों और परंपराओं के बीच संतुलन को लेकर चल रही बहस के बीच काफी अहम मानी जा रही है।