सुप्रीम कोर्ट ने महिला आरक्षण और अनिवार्य मतदान की याचिकाओं पर सुनवाई से किया इनकार, कहा—यह नीतिगत मामला
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को न्यायपालिका और सरकारी वकीलों के पदों पर महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण देने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि यह पूरी तरह नीतिगत निर्णय का विषय है, और याचिकाकर्ताओं को अपनी मांग संबंधित प्राधिकरण के समक्ष रखनी चाहिए।
महिला आरक्षण की मांग क्या थी?
याचिका में मांग की गई थी कि हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति के दौरान योग्य महिला उम्मीदवारों को बराबरी का अवसर दिया जाए और कम से कम 50 प्रतिशत प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाए। इसके साथ ही जिला अदालत, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में सरकार की ओर से पैरवी करने वाले वकीलों के पदों पर भी महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की मांग की गई थी।
क्या कहते हैं आंकड़े?
याचिका में संसद में पेश आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया कि देश में कुल 813 कार्यरत जजों में से केवल 116 महिलाएं हैं, जो लगभग 14.27 प्रतिशत है। सुप्रीम कोर्ट में वर्तमान में केवल एक महिला जज कार्यरत हैं। याचिका में इसे न्यायपालिका में गंभीर लैंगिक असंतुलन बताया गया।
हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि इस तरह के निर्णय नीति-निर्माण के दायरे में आते हैं और न्यायपालिका इसमें सीधे हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
अनिवार्य मतदान वाली याचिका पर भी इनकार
इसी तरह सुप्रीम कोर्ट ने मतदान को अनिवार्य बनाने की मांग वाली एक अन्य याचिका पर भी सुनवाई से इनकार कर दिया। याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि जो लोग जानबूझकर मतदान नहीं करते, उन पर जुर्माना लगाया जाए और उनकी सरकारी सुविधाएं सीमित की जाएं।
इस पर चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली बेंच ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि कोई गरीब व्यक्ति अपने काम के कारण मतदान नहीं कर पाता तो क्या उसे दंडित किया जाना चाहिए? कोर्ट ने कहा कि मतदान के प्रति जागरूकता बढ़ाना जरूरी है, लेकिन इसे अनिवार्य नहीं बनाया जा सकता।
अंत में अदालत ने दोनों मामलों को नीति-निर्माण से जुड़ा बताते हुए याचिकाकर्ताओं को संबंधित प्राधिकरण के पास जाने की सलाह दी।