{"vars":{"id": "130921:5012"}}

दहेज हत्या पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी, बोला- झूठी उम्मीदों ने ले ली बेटी की जान’
 

 

नई दिल्ली। दहेज हत्या के एक गंभीर मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को आरोपी पति को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। अदालत ने इस दौरान समाज और परिवारों की सोच पर भी कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि बेटियों की शादी बचाने की चिंता कई बार उनकी जान पर भारी पड़ जाती है।

जस्टिस पीके मिश्रा और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने फैसले की शुरुआत एक भावुक सवाल से की। अदालत ने कहा, “क्या युवा सोमा आचार्य की जान बचाई जा सकती थी? क्या सामाजिक बदनामी के डर की वजह से सोमा को भेड़ियों के हवाले कर दिया गया?”

सुप्रीम Court ने पाया कि सोमा ने कई बार अपने माता-पिता को ससुराल में हो रही प्रताड़ना के बारे में बताया था। वह कुछ समय के लिए मायके भी आई थी, लेकिन हर बार परिवार और गांव के बुजुर्गों ने समझौता कराने की कोशिश की और उसे वापस ससुराल भेज दिया गया।

बेंच ने कहा कि सोमा लगातार मदद की गुहार लगाती रही, लेकिन उसके परिवार वालों को यह झूठी उम्मीद थी कि समय के साथ हालात सुधर जाएंगे। अदालत ने टिप्पणी की, “उसके अपने लोगों ने भोलेपन में यह मान लिया था कि सब ठीक हो जाएगा, लेकिन उनकी उम्मीदें तब टूट गईं जब सोमा की ससुराल में दर्दनाक मौत हो गई।”

कोर्ट के मुताबिक, शादी के करीब 15 महीने बाद सोमा का शव फंदे से लटका मिला था। पति ने इसे आत्महत्या बताया, लेकिन अदालत ने मेडिकल और अन्य सबूतों के आधार पर इस दलील को खारिज कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड से साफ है कि सोमा को मोटरसाइकिल, टीवी और अन्य सामान की मांग को लेकर प्रताड़ित किया जाता था। उसके माता-पिता ने कुछ मांगें पूरी भी की थीं।

अदालत ने यह भी कहा कि मृतका के शरीर पर मिले चोट के निशान सामान्य आत्महत्या के मामलों से मेल नहीं खाते। मेडिकल रिपोर्ट से संकेत मिला कि मौत से पहले उसके साथ हिंसा की गई थी और यह मामला “नकली फांसी” का प्रतीत होता है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को समाज के लिए एक चेतावनी बताते हुए कहा कि दहेज प्रताड़ना की शिकायतों को हल्के में लेना और केवल समझौते के भरोसे बेटियों को वापस भेजना कई बार जानलेवा साबित हो सकता है।