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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: OBC क्रीमी लेयर तय करने में सिर्फ आय नहीं, सामाजिक और पेशेवर स्थिति भी होगी अहम
 

 

नई दिल्ली: Supreme Court of India ने अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के आरक्षण से जुड़े क्रीमी लेयर निर्धारण को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा है कि किसी व्यक्ति को क्रीमी लेयर में शामिल करने का फैसला केवल उसकी पारिवारिक आय के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसके लिए उसके सामाजिक और पेशेवर पद (स्टेटस) को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि पदों की श्रेणियों और सामाजिक स्थिति के मापदंडों को नजरअंदाज कर सिर्फ आय के आधार पर क्रीमी लेयर का दर्जा तय करना कानून की दृष्टि से टिकाऊ नहीं है। अदालत के अनुसार, क्रीमी लेयर निर्धारित करते समय आय के साथ-साथ व्यक्ति की सामाजिक और व्यावसायिक स्थिति का भी आकलन किया जाना चाहिए।

क्रीमी लेयर क्या है?

क्रीमी लेयर OBC समुदाय के उन लोगों को कहा जाता है जो आर्थिक और सामाजिक रूप से अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में होते हैं। ऐसे लोगों को आरक्षण का लाभ नहीं दिया जाता ताकि आरक्षण का फायदा समुदाय के वास्तव में पिछड़े और जरूरतमंद वर्ग तक पहुंच सके।

1992 के ऐतिहासिक फैसले में तय हुआ सिद्धांत

क्रीमी लेयर की अवधारणा को Indra Sawhney vs Union of India मामले में स्थापित किया गया था। इस ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि OBC आरक्षण का लाभ समाज के कमजोर और पिछड़े वर्गों को मिलना चाहिए, न कि आर्थिक और सामाजिक रूप से संपन्न लोगों को।

आय सीमा क्या है?

वर्तमान नियमों के अनुसार यदि किसी OBC परिवार की वार्षिक आय 8 लाख रुपये से अधिक है, तो उसे क्रीमी लेयर में माना जाता है। ऐसे उम्मीदवारों को सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में OBC आरक्षण का लाभ नहीं मिलता। यह आय सीमा वर्ष 2017 में 6 लाख रुपये से बढ़ाकर 8 लाख रुपये की गई थी।

सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणी से यह स्पष्ट हो गया है कि क्रीमी लेयर का निर्धारण केवल आय के आंकड़ों पर आधारित नहीं होगा, बल्कि सामाजिक और पेशेवर स्थिति जैसे अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं को भी ध्यान में रखा जाएगा।