सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: दिव्यांगता पेंशन दया नहीं, पूर्व सैनिकों का अधिकार
नई दिल्ली I सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को स्पष्ट किया कि पूर्व सैनिकों को मिलने वाली दिव्यांगता पेंशन कोई इनाम, अनुग्रह राशि या सरकार की दया पर निर्भर नहीं है। यह राष्ट्र की सेवा में दिए गए बलिदान का सम्मान है और एक पक्का कानूनी अधिकार है।
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे की पीठ ने केंद्र सरकार की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल (एएफटी) के आदेश को चुनौती दी गई थी। एएफटी ने एक पूर्व सैनिक को दिव्यांगता पेंशन देने का निर्देश दिया था।
कोर्ट ने कहा कि दिव्यांगता पेंशन दान या उदारता का विषय नहीं है, बल्कि यह पिछली सेवाओं के बदले मिलने वाले पारिश्रमिक का स्थगित हिस्सा है। शर्तें पूरी होने पर यह एक वेस्टेड राइट (निहित अधिकार) बन जाता है, जो संपत्ति के समान है।
पीठ ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की, “पेंशन का अधिकार संपत्ति जैसा है। इसे कानून के दखल के सिवा न तो रोका जा सकता है, न घटाया जा सकता है और न ही खत्म किया जा सकता है।”
कोर्ट ने आगे कहा कि पूर्व सैनिकों को जो बकाया राशि कोर्ट के फैसले और सरकारी नीति से मिलनी तय हो चुकी है, उसे रोकना उनकी संपत्ति छीनने के समान होगा। यह संविधान के अनुच्छेद 300ए का उल्लंघन माना जाएगा।
अदालत ने दोहराया कि दिव्यांगता पेंशन एक महत्वपूर्ण अधिकार है। एक बार पेंशन देने का फैसला हो जाए, तो उसका भुगतान उसी तारीख से किया जाना चाहिए, जिस दिन से वह बनती है। केंद्र सरकार चयनात्मक या भेदभावपूर्ण रवैया नहीं अपना सकती।
यह फैसला पूर्व सैनिकों के लिए बड़ी राहत है, क्योंकि इससे एरियर का भुगतान 1996 या रिटायरमेंट की तारीख से बिना तीन साल की सीमा के किया जा सकेगा। कोर्ट ने केंद्र की अपील खारिज कर एएफटी के फैसले को बरकरार रखा।