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भारत में लागू होगी 'थिएटर कमांड' व्यवस्था! तीनों सेनाएं आएंगी एक कमांडर के अधीन, CDS पेश करेंगे अंतिम खाका
 

 

 

नई दिल्ली। भारतीय थल सेना, वायु सेना और नौसेना को एकीकृत कर 'थिएटर कमांड' व्यवस्था लागू करने की वर्षों पुरानी योजना अब अंतिम चरण में पहुंच गई है। मई के अंत में पदभार संभालने वाले नए चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल एनएस राजा सुब्रमणी जल्द ही इस ऐतिहासिक सैन्य सुधार का अंतिम खाका रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के समक्ष प्रस्तुत करेंगे। माना जा रहा है कि कारगिल विजय दिवस के बाद जुलाई के अंत में इस पर महत्वपूर्ण प्रस्तुति दी जाएगी।

क्या है थिएटर कमांड?

वर्तमान व्यवस्था में भारतीय थल सेना, वायु सेना और नौसेना अलग-अलग कमांड और रणनीति के तहत कार्य करती हैं। युद्ध या किसी बड़े संकट की स्थिति में तीनों सेनाएं आपसी तालमेल से ऑपरेशन चलाती हैं।

नई थिएटर कमांड प्रणाली में किसी निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में तीनों सेनाओं की ताकत को एक ही कमांड के तहत रखा जाएगा। उस क्षेत्र का एक फोर-स्टार थिएटर कमांडर तय करेगा कि थल सेना, वायु सेना और नौसेना की क्षमताओं का इस्तेमाल किस प्रकार किया जाए। इससे युद्ध के समय निर्णय लेने की प्रक्रिया अधिक तेज और प्रभावी होगी।

तीन थिएटर कमांड बनने की संभावना

प्रारंभिक योजना के अनुसार देश में तीन प्रमुख थिएटर कमांड बनाई जा सकती हैं—

उत्तरी थिएटर कमांड – चीन सीमा की सुरक्षा पर फोकस।
पश्चिमी थिएटर कमांड – पाकिस्तान सीमा की जिम्मेदारी।
मैरीटाइम थिएटर कमांड – समुद्री सीमाओं और हिंद महासागर की सुरक्षा।

इन सभी कमांड का नेतृत्व फोर-स्टार अधिकारी करेंगे, जिनका दर्जा वर्तमान सेना, नौसेना और वायु सेना प्रमुखों के बराबर होगा।

क्यों जरूरी है यह बदलाव?

आधुनिक युद्ध केवल जमीन, हवा या समुद्र तक सीमित नहीं रह गया है। अब साइबर स्पेस, अंतरिक्ष और तकनीकी युद्ध भी सैन्य रणनीति का अहम हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे में अलग-अलग कमांड के बजाय एकीकृत कमांड से तेजी से निर्णय लेना और संयुक्त सैन्य कार्रवाई करना आसान होगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले वर्ष पाकिस्तान के साथ चार दिनों तक चले तनाव के दौरान तीनों सेनाओं के प्रमुखों को अस्थायी रूप से एक ही वॉर रूम में बैठकर समन्वय करना पड़ा था। इस अनुभव ने संयुक्त थिएटर कमांड की आवश्यकता को और मजबूत किया।

अभी क्या है सबसे बड़ी चुनौती?

हालांकि, आजादी के बाद के सबसे बड़े सैन्य सुधारों में शामिल इस योजना के सामने कुछ महत्वपूर्ण चुनौतियां भी हैं। सबसे बड़ा मुद्दा 'फोर्स जनरेशन' और 'फोर्स एप्लीकेशन' को लेकर है।

यानी सैनिकों की भर्ती, प्रशिक्षण और हथियारों की खरीद की जिम्मेदारी मौजूदा सेना प्रमुखों के पास ही रहेगी, जबकि युद्ध के दौरान उन सैनिकों और संसाधनों का उपयोग किस प्रकार और कहां किया जाएगा, इसका निर्णय थिएटर कमांडर करेगा। इसी अधिकार और बजट के बंटवारे को लेकर अंतिम स्तर पर चर्चा जारी है।

यदि यह व्यवस्था लागू होती है तो यह भारतीय सशस्त्र बलों के इतिहास में सबसे बड़े संरचनात्मक सुधारों में से एक माना जाएगा, जिससे तीनों सेनाओं की संयुक्त युद्ध क्षमता और सामरिक प्रभावशीलता में बड़ा बदलाव आने की उम्मीद है।