क्या BRICS बदलेगा दुनिया का ग्लोबल सिस्टम? UN का विकल्प बनने पर भारत को क्या मिलेगा फायदा
नई दिल्ली में हुए BRICS Summit 2026 के बीच एक बड़ा सवाल फिर चर्चा में है—क्या आने वाले समय में BRICS संयुक्त राष्ट्र का विकल्प बन सकता है? हालांकि मौजूदा परिस्थितियों में BRICS को संयुक्त राष्ट्र की जगह लेने वाला संगठन मानना जल्दबाजी होगी, लेकिन वैश्विक राजनीति में इसकी बढ़ती भूमिका और Global South की आवाज को मजबूत करने की कोशिश इसे तेजी से महत्वपूर्ण मंच बना रही है।
BRICS लंबे समय से वैश्विक संस्थाओं में विकासशील देशों की बेहतर भागीदारी की मांग करता रहा है। खासकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधार का मुद्दा इसके एजेंडे में प्रमुख रहा है। 2026 के BRICS Summit में भी वैश्विक संस्थाओं को ज्यादा प्रतिनिधित्वपूर्ण और संतुलित बनाने की जरूरत पर जोर दिया गया।
क्या BRICS वास्तव में UN की जगह ले सकता है?
BRICS की आर्थिक और राजनीतिक ताकत पिछले कुछ वर्षों में बढ़ी है, लेकिन इसे संयुक्त राष्ट्र का सीधा विकल्प मानना अभी मुश्किल है। दोनों संगठनों की प्रकृति, भूमिका और संरचना अलग है। संयुक्त राष्ट्र एक व्यापक वैश्विक संस्था है, जिसमें लगभग पूरी दुनिया के देश शामिल हैं और शांति, सुरक्षा, मानवीय सहायता, अंतरराष्ट्रीय कानून तथा वैश्विक सहयोग जैसे कई क्षेत्रों में इसकी भूमिका है।
इसके मुकाबले BRICS मुख्य रूप से उभरती अर्थव्यवस्थाओं और Global South के देशों के बीच सहयोग का मंच है। इसका विस्तार जरूर हुआ है और अब यह पहले के पांच देशों के समूह से काफी बड़ा हो चुका है। 2026 में BRICS में 11 सदस्य हैं और यह दुनिया की लगभग आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करता है।
इसलिए BRICS के लिए संयुक्त राष्ट्र को पूरी तरह बदलने की बजाय वैश्विक व्यवस्था में एक प्रभावशाली समानांतर आवाज और सुधार के दबाव को मजबूत करने वाले मंच के रूप में देखना ज्यादा सही होगा।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है BRICS?
भारत के लिए BRICS की अहमियत सिर्फ आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं है। नई दिल्ली लंबे समय से वैश्विक संस्थाओं में विकासशील देशों की भागीदारी बढ़ाने की मांग कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने BRICS Summit में भी कहा कि Global South को केवल नियमों का पालन करने वाला नहीं, बल्कि वैश्विक नियम बनाने में भूमिका निभाने वाला होना चाहिए।
भारत के लिए BRICS एक ऐसा मंच है, जहां वह पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंध बनाए रखते हुए रूस, चीन और Global South के दूसरे देशों के साथ भी संवाद कर सकता है। यही रणनीतिक संतुलन भारत की विदेश नीति में BRICS को महत्वपूर्ण बनाता है।
Global South की आवाज को मिल सकता है बड़ा मंच
BRICS की सबसे बड़ी संभावनाओं में से एक Global South के देशों को ज्यादा प्रभावी मंच देना है। विकासशील देश लंबे समय से शिकायत करते रहे हैं कि मौजूदा वैश्विक संस्थाओं में उनकी आर्थिक और जनसंख्या संबंधी हिस्सेदारी के मुकाबले उनकी निर्णय लेने की शक्ति कम है।
BRICS इसी असंतुलन को चुनौती देने की कोशिश करता है। समूह वैश्विक वित्तीय संस्थाओं, सुरक्षा व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय निर्णय प्रक्रिया में विकासशील देशों की अधिक भागीदारी की मांग को आगे बढ़ा रहा है। 2026 के शिखर सम्मेलन में भी बहुध्रुवीय और ज्यादा प्रतिनिधित्वपूर्ण वैश्विक व्यवस्था पर जोर दिया गया।
UNSC सुधार पर भारत का जोर
BRICS Summit में प्रधानमंत्री मोदी ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की जरूरत को प्रमुखता से उठाया। उनका तर्क है कि दुनिया की मौजूदा आर्थिक, जनसांख्यिकीय और भू-राजनीतिक वास्तविकताएं 1945 के दौर से काफी अलग हैं। ऐसे में वैश्विक संस्थाओं की संरचना में भी बदलाव होना चाहिए।
दिलचस्प बात यह है कि BRICS Summit के दौरान संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि मौजूदा वैश्विक संस्थागत ढांचे को आज की वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करना चाहिए और भारत इस मांग में अग्रणी भूमिका निभा रहा है।
BRICS की ताकत के साथ चुनौतियां भी कम नहीं
हालांकि BRICS का प्रभाव बढ़ रहा है, लेकिन इसके सामने कई बड़ी चुनौतियां हैं। समूह में शामिल देशों की राजनीतिक प्राथमिकताएं और विदेश नीति के हित हमेशा एक जैसे नहीं होते। भारत और चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा है, जबकि रूस, ईरान और अन्य सदस्य देशों के अपने अलग भू-राजनीतिक हित हैं।
ऐसे में किसी एक मुद्दे पर सभी देशों को लंबे समय तक एकमत रखना आसान नहीं है। यही कारण है कि BRICS के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल सदस्य देशों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि अलग-अलग हितों वाले देशों के बीच व्यावहारिक और लगातार सहयोग कायम करना है। विश्लेषकों के मुताबिक BRICS की वास्तविक सफलता इस बात से तय होगी कि वह घोषणाओं को कितनी प्रभावी