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महिला आरक्षण बिल पर फिर सियासी हलचल, अखिलेश यादव ने रखी अपनी शर्तें

 

New Delhi : संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई से शुरू होने जा रहा है। इस सत्र में केंद्र सरकार महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक को दोबारा लाने पर गंभीरता से विचार कर रही है। सूत्रों के अनुसार, सरकार विधेयक पारित कराने के लिए कई राजनीतिक दलों से संपर्क साध रही है और बदले हुए संसदीय समीकरणों को अपने पक्ष में मान रही है।

हाल के महीनों में विपक्ष के कुछ दलों में हुए राजनीतिक बदलाव और टूट के बाद सरकार को उम्मीद है कि इस बार संसद में संख्या बल पहले की तुलना में अधिक अनुकूल रहेगा। इसी बीच समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव के एक सोशल मीडिया पोस्ट ने भी राजनीतिक हलकों में नई चर्चा छेड़ दी है।

बदले संसदीय गणित पर सरकार की नजर

20 जुलाई से शुरू होने वाले मानसून सत्र में सरकार सिर्फ अपने सहयोगी दलों पर ही नहीं, बल्कि विपक्ष के कुछ दलों के बदले रुख पर भी नजर बनाए हुए है। तृणमूल कांग्रेस, शिवसेना समेत कुछ दलों में हुए राजनीतिक घटनाक्रम के बाद सरकार को उम्मीद है कि पहले अटके विधेयकों को आगे बढ़ाने का अवसर मिल सकता है।

अखिलेश यादव ने रखीं अपनी शर्तें

समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पर महिलाओं के साथ तस्वीर साझा करते हुए लिखा कि उनकी मांग है कि परिसीमन के साथ राज्यसभा की सीटों में भी बढ़ोतरी की जाए। उन्होंने महिला आरक्षण में पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के तहत पिछड़े वर्ग और मुस्लिम महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व देने की भी मांग की। साथ ही उन्होंने उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से ही महिला आरक्षण लागू करने की वकालत की।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अखिलेश यादव ने समर्थन के संकेत तो दिए हैं, लेकिन इसके साथ अपनी राजनीतिक शर्तें भी स्पष्ट कर दी हैं।

पिछली बार संख्या के अभाव में अटका था विधेयक

बजट सत्र के दौरान महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े 131वें संविधान संशोधन विधेयक पर मतदान के समय विपक्ष की एकजुटता कमजोर दिखाई दी थी। महिला आरक्षण के समर्थन के बावजूद कई विपक्षी दल परिसीमन और लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने के पक्ष में नहीं थे। आवश्यक दो-तिहाई बहुमत नहीं मिलने के कारण विधेयक पारित नहीं हो सका था।

मानसून सत्र में होगी बड़ी राजनीतिक परीक्षा

अब बदले राजनीतिक समीकरणों के बीच सरकार को उम्मीद है कि इस बार संसद का गणित उसके पक्ष में हो सकता है। हालांकि विपक्ष का अंतिम रुख मानसून सत्र के दौरान ही स्पष्ट होगा। महिला आरक्षण और परिसीमन का मुद्दा इस बार संसद के साथ-साथ देश की राजनीति का भी प्रमुख केंद्र बनने की संभावना है।