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मैं पेश नहीं होऊंगा- केजरीवाल का सत्याग्रह का ऐलान, आगे क्या करेगा कोर्ट?

दिल्ली आबकारी नीति मामले में अरविंद केजरीवाल ने हाईकोर्ट की कार्यवाही में शामिल न होने का ऐलान किया है, जिसे उन्होंने ‘गांधीवादी सत्याग्रह’ बताया। इस फैसले से कानूनी और राजनीतिक हलकों में बहस तेज हो गई है कि क्या अदालत की प्रक्रिया बिना उनकी भागीदारी के आगे बढ़ेगी।

 

Arvind Kejriwal Boycotts Judge: अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली आबकारी नीति मामले में बड़ा फैसला लेते हुए कहा है कि वह अब दिल्ली उच्च न्यायालय की कार्यवाही में हिस्सा नहीं लेंगे। उन्होंने इसे “गांधीवादी सत्याग्रह” करार देते हुए कहा कि वह न तो व्यक्तिगत रूप से और न ही अपने वकीलों के जरिए आगे की सुनवाई में शामिल होंगे।

न्यायाधीश पर पक्षपात के आरोप, याचिका पहले ही खारिज

केजरीवाल ने यह कदम उस समय उठाया जब उनकी ओर से न्यायाधीश स्वर्ण कांता शर्मा को मामले से अलग करने की मांग की गई थी, जिसे अदालत ने खारिज कर दिया। उनका आरोप है कि न्यायिक निष्पक्षता को लेकर गंभीर सवाल हैं और ऐसी स्थिति में सुनवाई जारी रहना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।

क्या है पूरा मामला?

यह विवाद दिल्ली की कथित आबकारी नीति से जुड़ा है, जिसकी जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो कर रही है। निचली अदालत पहले ही इस मामले में सभी 23 आरोपियों को आरोपमुक्त कर चुकी है, लेकिन इस फैसले को चुनौती देते हुए सीबीआई ने हाईकोर्ट में अपील दायर की है।

केजरीवाल का तर्क: ‘न्याय पर सवाल, इसलिए दूरी’

केजरीवाल ने अपने बयान में कहा कि वह इस फैसले के संभावित कानूनी परिणामों से अवगत हैं, लेकिन फिर भी वह इस रास्ते को अपनाने के लिए तैयार हैं। उनका कहना है कि यह कदम न्यायिक प्रक्रिया पर सवाल उठाने के बजाय अपने सिद्धांतों पर टिके रहने का तरीका है।

क्या बिना मौजूदगी के भी चलेगी सुनवाई?

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि किसी आरोपी के अनुपस्थित रहने से सुनवाई रुकती नहीं है। अदालत के पास कई विकल्प होते हैं, जरूरत पड़ने पर वारंट जारी किया जा सकता है, जमानती शर्तें लागू की जा सकती हैं या फिर अदालत किसी स्वतंत्र वकील को नियुक्त कर सकती है, जो आरोपी के पक्ष को प्रस्तुत करे।

कानूनी विशेषज्ञों की राय

वरिष्ठ वकीलों के अनुसार, आपराधिक मामलों में एकतरफा सुनवाई संभव नहीं होती, लेकिन अदालत यह सुनिश्चित करती है कि न्याय प्रक्रिया बाधित न हो। अगर कोई आरोपी जानबूझकर अनुपस्थित रहता है, तो अदालत उसके खिलाफ सख्त कदम भी उठा सकती है।

अदालतों के पुराने फैसलों का संकेत

पूर्व के न्यायिक निर्णयों में यह स्पष्ट किया गया है कि यदि कोई आरोपी जानबूझकर अदालत की प्रक्रिया से बचता है, तो वह बाद में इसके परिणामों की शिकायत नहीं कर सकता। ऐसे मामलों में अदालत सुनवाई जारी रखते हुए कानूनी कार्रवाई को आगे बढ़ा सकती है।

आगे क्या?

इस मामले की अगली सुनवाई जल्द होने वाली है और यह देखा जाएगा कि केजरीवाल के इस कदम का न्यायिक प्रक्रिया पर क्या असर पड़ता है। यह स्थिति अदालत और आरोपी के अधिकारों के बीच संतुलन की एक अहम परीक्षा मानी जा रही है।