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शिवसेना-BJP गठबंधन में बढ़ी टेंशन, कई नेताओं ने पार्टी उम्मीदवारों के खिलाफ भरा पर्चा

महाराष्ट्र विधान परिषद चुनाव 2026 में महायुति और महाविकास अघाड़ी दोनों में बगावत तेज हो गई है। टिकट बंटवारे से नाराज कई नेताओं ने निर्दलीय नामांकन दाखिल कर दिया है। शिवसेना, भाजपा, एनसीपी और कांग्रेस के भीतर बढ़ती नाराजगी ने चुनावी मुकाबले को और दिलचस्प बना दिया है।

 

महाराष्ट्र में विधान परिषद की 17 सीटों पर होने वाले चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मी तेज हो गई है। महायुति और महाविकास अघाड़ी दोनों गठबंधनों में टिकट बंटवारे को लेकर अंदरूनी नाराजगी खुलकर सामने आने लगी है। कई नेताओं ने पार्टी के अधिकृत उम्मीदवारों के खिलाफ ही चुनाव मैदान में उतरकर राजनीतिक समीकरण बदल दिए हैं।

छत्रपति संभाजीनगर से दोनों गठबंधनों के नेताओं के बयानों ने राजनीतिक हलचल और बढ़ा दी है। पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार, शिवसेना (यूबीटी) नेता अंबादास दानवे ने भाजपा पर गंभीर आरोप लगाए हैं। वहीं शिवसेना के वरिष्ठ नेता और विधायक अब्दुल सत्तार ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि “भाजपा ने जहां शिवसेना (यूबीटी) के हाथ-पैर काट दिए, वहीं छत्रपति संभाजीनगर में शिवसेना का सिर ही काट दिया।”

सभी 17 सीटों पर महायुति की पूरी ताकत

विधान परिषद चुनाव के लिए महायुति और महाविकास अघाड़ी के उम्मीदवारों ने नामांकन दाखिल कर दिया है। भाजपा, शिवसेना और एनसीपी वाला महायुति गठबंधन सभी 17 सीटों पर चुनाव लड़ रहा है। हालांकि सबसे ज्यादा मुश्किल महायुति के सामने ही खड़ी हो गई है, क्योंकि कई सीटों पर उसके अपने ही नेता बागी बनकर मैदान में उतर गए हैं।

अब्दुल सत्तार के बेटे की एंट्री से बढ़ी हलचल

छत्रपति संभाजीनगर-जालना सीट सबसे ज्यादा चर्चा में है। भाजपा ने यहां से सुहास शिरसाठ को उम्मीदवार बनाया है। इससे नाराज शिवसेना विधायक अब्दुल सत्तार ने अपने बेटे समीर सत्तार को चुनाव मैदान में उतार दिया है।

अब्दुल सत्तार ने भाजपा को सीट दिए जाने पर खुलकर नाराजगी जताई है। उनके इस कदम ने महायुति में अंदरूनी तनाव को और बढ़ा दिया है।

सुप्रिया सुले के समधी को BJP टिकट, इसलिए बढ़ी चर्चा

चंद्रपुर-वर्धा-गढ़चिरौली सीट भी चर्चा का केंद्र बनी हुई है। भाजपा ने यहां से अरुण लखानी को उम्मीदवार बनाया है। खास बात यह है कि अरुण लखानी एनसीपी सांसद सुप्रिया सुले के समधी हैं।

अरुण लखानी के बेटे सारंग और सुप्रिया सुले की बेटी रेवती की शादी जून में होने वाली है। ऐसे में इस सीट पर राजनीतिक और पारिवारिक दोनों कारणों से लोगों की नजर बनी हुई है।

महायुति में कहां-कहां बगावत?

रायगढ़

राष्ट्रवादी कांग्रेस ने अनिकेत तटकरे को टिकट दिया है। इसके विरोध में शिवसेना नेता महेंद्र दलवी की बेटी जुईली दलवी मैदान में उतर गई हैं।

संभाजीनगर-जालना

भाजपा के सुहास शिरसाठ के खिलाफ शिवसेना विधायक अब्दुल सत्तार के बेटे समीर सत्तार ने नामांकन दाखिल किया है।

यवतमाल

शिवसेना के दुष्यंत चतुर्वेदी को टिकट मिलने से भाजपा के नितिन भुतडा और एनसीपी के साजिद बेग नाराज होकर मैदान में उतर गए हैं।

पुणे

एनसीपी के विक्रम काकड़े को टिकट मिलने के बाद भाजपा के प्रदीप कंद ने बगावत कर दी।

अमरावती

भाजपा के प्रवीण पोटे के खिलाफ शिवसेना के विप्लव बाजोरीय ने मोर्चा खोल दिया है।

नासिक

शिवसेना के नरेंद्र दराडे को टिकट मिलने से निर्दलीय गोकूल गिते और गणेश गिते मैदान में उतर गए हैं। दोनों को भाजपा मंत्री गिरीश महाजन का करीबी माना जाता है।

परभणी

शिवसेना की सईदा खान के खिलाफ एनसीपी के विजय जामकर और जिला परिषद सदस्य संग्राम जामकर ने नामांकन किया है।

नांदेड

भाजपा के अमरनाथ राजूरकर के खिलाफ एनसीपी नेता प्रवीण पाटील चिखलीकर मैदान में हैं।

जलगांव

भाजपा के नंदकिशोर महाजन के खिलाफ शिवसेना की रेश्मा काले और दीपक धांडे ने बगावत कर दी है।

महाविकास अघाड़ी में भी अंदरूनी कलह

महाविकास अघाड़ी यानी कांग्रेस, शिवसेना (यूबीटी) और एनसीपी (शरद पवार गुट) 15 सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं। इनमें कांग्रेस 8, एनसीपी (शरद गुट) 4 और शिवसेना (यूबीटी) 3 सीटों पर मैदान में है। हालांकि इस गठबंधन में भी कई सीटों पर बगावत सामने आई है।

नांदेड

कांग्रेस उम्मीदवार रामदास सुमठाणकर के खिलाफ माधवगांव जवळकर और ठाकरे गुट से कृष्णा अष्टीकर ने बगावत की है।

भंडारा-गोंदिया

कांग्रेस के प्रफुल्ल अग्रवाल को टिकट मिलने के बाद नरेश ईश्वरकर और दिलीप बनसोड ने नामांकन दाखिल किया।

सांगली

शरद पवार गुट के बालासाहेब पाटिल के खिलाफ कांग्रेस के संजय मेंढे और मयूर पाटिल मैदान में हैं।

सोलापुर

कांग्रेस उम्मीदवार आदित्य फत्तेपूरकर के खिलाफ शरद पवार गुट के वसंत नाना देशमुख और ठाकरे गुट के नागेश अक्कलकोटे ने बगावत कर दी है।

मुकाबला हुआ और दिलचस्प

स्थानीय निकायों में संख्या बल के हिसाब से महायुति मजबूत स्थिति में मानी जा रही है। हालांकि बागियों की बढ़ती संख्या ने चुनाव को बेहद दिलचस्प बना दिया है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि इन बागी उम्मीदवारों का असर चुनावी नतीजों पर कितना पड़ता है।