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बंगाल में TMC की नींव हिली! 58 विधायकों की बगावत, 20 सांसदों पर भी सस्पेंस, ममता बनर्जी के सामने 28 साल की सबसे बड़ी चुनौती

पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा भूचाल आ गया है। TMC के 58 विधायक बगावत पर उतर आए हैं और रितब्रत बनर्जी के नेतृत्व में पार्टी के भीतर नया शक्ति केंद्र उभरता दिख रहा है। रिपोर्ट्स में 20 सांसदों के संपर्क में होने का दावा भी किया गया है। ममता बनर्जी के सामने यह 28 वर्षों की सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती मानी जा रही है।
 

कोलकाता: पश्चिम बंगाल की सियासत में ऐसा राजनीतिक भूचाल आया है जिसने तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भविष्य को लेकर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। पार्टी की स्थापना के 28 वर्षों बाद पहली बार ममता बनर्जी को अपने ही संगठन के भीतर इतने बड़े विद्रोह का सामना करना पड़ रहा है। पार्टी के बागी खेमे का दावा है कि उसके साथ 58 विधायक हैं, जबकि कई रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि करीब 20 सांसदों से भी संपर्क साधा जा रहा है।

राजनीतिक जानकार इसे सिर्फ एक आंतरिक विवाद नहीं बल्कि TMC के अस्तित्व और नेतृत्व संरचना के लिए अब तक की सबसे बड़ी चुनौती मान रहे हैं।

रितब्रत बनर्जी बने बगावत का चेहरा

पूरा घटनाक्रम उस समय तेजी से बदला जब पार्टी से निष्कासित विधायक रितब्रत बनर्जी के नेतृत्व में बागी खेमे ने विधानसभा अध्यक्ष के सामने अपना शक्ति प्रदर्शन किया। बागी गुट ने दावा किया कि उसके पास दो-तिहाई से अधिक विधायकों का समर्थन है और इसी आधार पर विधानसभा में अपनी अलग पहचान स्थापित करने की कोशिश शुरू की।

रिपोर्ट्स के मुताबिक बागी विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष को हस्ताक्षरयुक्त पत्र सौंपकर रितब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता देने की मांग की थी। बाद में उन्हें नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता भी मिल गई, जिससे ममता खेमे को बड़ा झटका लगा।

दिलचस्प मोड़: ममता के खिलाफ नहीं, अभिषेक के खिलाफ मोर्चा

इस राजनीतिक संकट की सबसे दिलचस्प बात यह है कि बागी विधायक सीधे तौर पर ममता बनर्जी के खिलाफ नहीं दिख रहे हैं। कई बागी नेताओं ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि वे अब भी ममता बनर्जी को पार्टी का सर्वोच्च चेहरा मानते हैं, लेकिन वे अभिषेक बनर्जी की भूमिका और पार्टी संचालन के तरीके से असंतुष्ट हैं।

बागी गुट ने संकेत दिया है कि वह ममता बनर्जी का सम्मान करता है, लेकिन विधानसभा दल में अभिषेक बनर्जी के प्रभाव को स्वीकार करने को तैयार नहीं है। यही वजह है कि मौजूदा संकट को कई राजनीतिक विश्लेषक “ममता बनाम बागी” नहीं बल्कि “अभिषेक बनाम बागी” संघर्ष के रूप में देख रहे हैं।

58 विधायक खुलकर आए, अब सांसदों पर नजर

बागी खेमे के शक्ति प्रदर्शन के बाद राजनीतिक हलकों में यह चर्चा और तेज हो गई है कि TMC के कई सांसद भी नेतृत्व से नाराज हैं। कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया है कि करीब 20 सांसद विभिन्न राजनीतिक विकल्पों पर विचार कर रहे हैं और उनसे संपर्क साधा जा रहा है। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इससे पार्टी नेतृत्व की चिंता बढ़ गई है।

ममता की बैठक से दूरी ने बढ़ाए थे संकेत

बंगाल विधानसभा चुनाव में हार के बाद से ही पार्टी के भीतर असंतोष की खबरें सामने आ रही थीं। हाल के दिनों में ममता बनर्जी द्वारा बुलाई गई बैठकों में बड़ी संख्या में विधायक अनुपस्थित रहे। एक बैठक में तो 80 में से लगभग 60 विधायक शामिल नहीं हुए थे, जिसे बाद में बढ़ती नाराजगी का शुरुआती संकेत माना गया।

यही नहीं, ममता बनर्जी के हालिया विरोध प्रदर्शन में भी बेहद कम विधायक और सांसद नजर आए थे, जिससे संगठन के भीतर चल रही खींचतान की चर्चाओं को और बल मिला।

स्पीकर के फैसले से ममता खेमे को झटका

मामला तब और गंभीर हो गया जब विधानसभा अध्यक्ष ने रितब्रत बनर्जी और संदीपन साहा के निष्कासन को प्रक्रियागत रूप से वैध नहीं माना। अध्यक्ष ने कहा कि पार्टी द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था, इसलिए निष्कासन को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

इस फैसले ने बागी खेमे को कानूनी और राजनीतिक दोनों स्तर पर मजबूती दी है।

बागी खेमे में भी दिखने लगी दरार?

हालांकि बागी गुट की एकजुटता पर भी सवाल उठने लगे हैं। हालिया बैठकों में सभी विधायक शामिल नहीं हुए और कुछ नेताओं ने मांग की कि ममता बनर्जी को सिर्फ सलाहकार नहीं बल्कि संगठन का सर्वोच्च पद दिया जाए। इससे संकेत मिल रहे हैं कि बागी गुट के भीतर भी नेतृत्व और रणनीति को लेकर अलग-अलग राय मौजूद है।

ममता बनर्जी का पलटवार

बढ़ते संकट के बीच ममता बनर्जी ने भी स्पष्ट संदेश दिया है कि पार्टी अनुशासन से समझौता नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि TMC अपने कार्यकर्ताओं के दम पर खड़ी है और पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल लोगों के बिना भी संगठन मजबूत रहेगा।

28 साल में पहली बार इतना बड़ा संकट

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि 1998 में TMC की स्थापना के बाद यह पहला अवसर है जब पार्टी की विधायी ताकत का इतना बड़ा हिस्सा नेतृत्व से अलग रुख अपनाता दिखाई दे रहा है। यही वजह है कि इस संकट को ममता बनर्जी के राजनीतिक करियर की सबसे कठिन परीक्षा माना जा रहा है।

आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि यह बगावत सिर्फ विधानसभा तक सीमित रहती है या फिर TMC के संगठनात्मक ढांचे और संसदीय राजनीति पर भी इसका असर पड़ता है। फिलहाल बंगाल की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ममता बनर्जी इस संकट को संभाल पाएंगी या TMC को अपने इतिहास के सबसे बड़े विभाजन का सामना करना पड़ेगा।