TMC में क्यों पड़ी फूट? 28 साल पुरानी पार्टी टूटने की कगार पर, ममता बनर्जी से आखिर कहां हुई चूक
West Bengal Politics: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में मिली करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) अपने सबसे बड़े राजनीतिक संकट से गुजर रही है। जिस पार्टी को ममता बनर्जी ने 1998 में कांग्रेस से अलग होकर खड़ा किया था और जिसे 28 वर्षों तक अपने नेतृत्व में मजबूत बनाया, वही पार्टी अब गंभीर आंतरिक बगावत का सामना कर रही है।
हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि पार्टी के 58 विधायकों ने अलग होकर विधायक दल पर नियंत्रण का दावा कर दिया है। राजनीतिक जानकार इसे तृणमूल कांग्रेस के इतिहास की सबसे बड़ी टूट मान रहे हैं।
कैसे शुरू हुआ बगावत का पूरा खेल?
राजनीतिक घटनाक्रम की शुरुआत 22 मई को दिल्ली स्थित बंगा भवन से हुई। यहां TMC के वरिष्ठ नेता और पूर्व राज्यसभा सांसद ऋतब्रता बनर्जी की मुलाकात पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से हुई।
शुरुआत में इसे सामान्य राजनीतिक मुलाकात माना गया, लेकिन अगले कुछ दिनों में हालात तेजी से बदल गए। ऋतब्रता बनर्जी ने सार्वजनिक रूप से विपक्षी नेताओं को सरकारी बैठकों में शामिल किए जाने के फैसले का समर्थन किया, जिसके बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई।
मात्र 13 दिनों के भीतर पार्टी के असंतुष्ट विधायकों ने अलग गुट बनाकर विधायक दल पर दावा ठोक दिया और ऋतब्रता बनर्जी को अपना नेता चुन लिया।
चुनावी हार ने खोल दी अंदरूनी दरारें
पश्चिम बंगाल चुनाव में हार के बाद पार्टी के भीतर लंबे समय से दबा असंतोष खुलकर सामने आने लगा। कई विधायकों और नेताओं का मानना था कि पार्टी का पूरा नियंत्रण धीरे-धीरे ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी के हाथों में सिमटता जा रहा है।
6 मई को नवनिर्वाचित विधायकों की बैठक में ममता बनर्जी द्वारा अभिषेक बनर्जी की भूमिका की सार्वजनिक सराहना और उनके लिए तालियां बजवाने की घटना ने कई वरिष्ठ नेताओं को असहज कर दिया। पार्टी के भीतर यह चर्चा शुरू हो गई कि TMC अब संगठन से ज्यादा एक परिवार के इर्द-गिर्द केंद्रित होती जा रही है।
अभिषेक बनर्जी की बढ़ती ताकत बनी असंतोष की वजह?
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक TMC के अंदर सबसे बड़ा असंतोष अभिषेक बनर्जी को लेकर ही रहा है। मुकुल रॉय, शुभेंदु अधिकारी और कई अन्य वरिष्ठ नेताओं को लंबे समय से यह महसूस हो रहा था कि पार्टी में उनकी भूमिका लगातार कम होती जा रही है जबकि अभिषेक का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है।
पुराने नेताओं का मानना था कि वर्षों के संघर्ष और राजनीतिक अनुभव को दरकिनार कर संगठन की कमान धीरे-धीरे एक ही परिवार के हाथों में केंद्रित की जा रही है।
'ओल्ड गार्ड' बनाम 'न्यू ब्रिगेड' की लड़ाई
तृणमूल कांग्रेस के भीतर लंबे समय से दो धड़े सक्रिय रहे हैं। पहला धड़ा उन नेताओं का है जो ममता बनर्जी के संघर्ष के दिनों से उनके साथ रहे और जिन्होंने पार्टी को जमीनी स्तर पर मजबूत किया। वहीं दूसरा धड़ा अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व में उभरी नई पीढ़ी का है। समय के साथ दोनों गुटों के बीच दूरी बढ़ती गई और यही दूरी अब खुली बगावत का रूप लेती दिखाई दे रही है।
I-PAC की एंट्री से क्यों नाराज हुए पुराने नेता?
2019 लोकसभा चुनाव के बाद ममता बनर्जी ने चुनावी रणनीति की जिम्मेदारी I-PAC को सौंपी थी।
I-PAC ने टिकट वितरण, संगठनात्मक समीक्षा और नेताओं के प्रदर्शन का मूल्यांकन शुरू किया। इससे कई पुराने नेताओं को लगा कि बाहरी सलाहकार पार्टी के पारंपरिक ढांचे में दखल दे रहे हैं। कई नेताओं ने इसे अपनी राजनीतिक हैसियत कम करने की कोशिश के रूप में देखा और धीरे-धीरे संगठन से दूरी बनानी शुरू कर दी।
घोटालों ने भी बढ़ाई मुश्किलें
पिछले कुछ वर्षों में शारदा चिटफंड, नारदा स्टिंग, शिक्षक भर्ती घोटाला, कोयला घोटाला और मवेशी तस्करी जैसे मामलों में TMC के कई बड़े नेताओं के नाम सामने आए।
CBI और ED की कार्रवाई ने पार्टी के भीतर असुरक्षा का माहौल पैदा किया। कई नेताओं को लगा कि राजनीतिक भविष्य बचाने के लिए वैकल्पिक रास्ते तलाशना जरूरी है। यही वजह रही कि कई नेता भाजपा या अन्य राजनीतिक विकल्पों की ओर बढ़ते गए।
भाजपा के उभार ने बदले समीकरण
2019 के बाद भाजपा पश्चिम बंगाल में मजबूत विपक्ष बनकर उभरी। TMC के असंतुष्ट नेताओं को भाजपा एक ऐसे राजनीतिक विकल्प के रूप में दिखाई देने लगी, जहां उन्हें भविष्य और राजनीतिक अवसर नजर आने लगे। शुभेंदु अधिकारी जैसे बड़े नेताओं का भाजपा में जाना पहले ही इस बदलाव का संकेत दे चुका था।
क्या अत्यधिक केंद्रीकरण भी बना वजह?
TMC के कई क्षेत्रीय नेताओं की शिकायत रही है कि पार्टी के सभी बड़े फैसले कोलकाता से तय किए जाते हैं। जिला स्तर के नेताओं को पर्याप्त स्वतंत्रता नहीं मिलने से नाराजगी बढ़ती गई। स्थानीय नेतृत्व को लगने लगा कि उनकी राजनीतिक हैसियत और निर्णय लेने की क्षमता लगातार सीमित की जा रही है।
क्या ममता बनर्जी की सबसे बड़ी ताकत ही कमजोरी बन गई?
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि TMC की सबसे बड़ी ताकत हमेशा ममता बनर्जी का व्यक्तित्व रहा। लेकिन समय के साथ पार्टी किसी मजबूत वैचारिक ढांचे की बजाय पूरी तरह नेतृत्व-केंद्रित बनती चली गई। जब चुनावी हार के बाद नेतृत्व पर सवाल उठने लगे तो संगठन को एकजुट रखने वाला वैचारिक आधार कमजोर दिखाई देने लगा।
आगे क्या होगा?
58 विधायकों की बगावत के बाद तृणमूल कांग्रेस के सामने अस्तित्व का सबसे बड़ा संकट खड़ा हो गया है। ममता बनर्जी अब भी बंगाल की सबसे प्रभावशाली नेता हैं, लेकिन यह पहली बार है जब उनकी पार्टी के भीतर इतनी बड़ी चुनौती सामने आई है।
आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि ममता बनर्जी इस राजनीतिक संकट से पार्टी को उबार पाती हैं या बंगाल की राजनीति एक नए दौर में प्रवेश करने जा रही है। फिलहाल इतना तय है कि 2026 की चुनावी हार ने केवल सत्ता नहीं छीनी, बल्कि TMC के भीतर वर्षों से पनप रहे असंतोष को भी खुलकर सामने ला दिया है।