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15 मीटर दूर से रात में सटीक निशाना कैसे? यूपी पुलिस के हॉफ एनकाउंटर पर हाईकोर्ट ने उठाए सवाल, CBI जांच के आदेश

 

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती जिले में हुए कथित हॉफ एनकाउंटर के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने सख्त रुख अपनाते हुए सीबीआई जांच के आदेश दिए हैं। कोर्ट ने प्रथम दृष्टया पुलिस की कहानी में कई गंभीर विसंगतियां पाईं और कहा कि थाना प्रभारी की ओर से घटना का गलत विवरण प्रस्तुत किया गया प्रतीत होता है। हाईकोर्ट ने सीबीआई को जांच पूरी कर यथासंभव तीन महीने के भीतर रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है।

थाना प्रभारी की निशानेबाजी क्षमता की भी होगी जांच

यह आदेश अलाउद्दीन उर्फ छोटकऊ की ओर से दाखिल आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया। मामला श्रावस्ती के इकौना थाने में बीएनएस की धारा 109 और आर्म्स एक्ट की धारा 3/25 के तहत दर्ज एफआईआर से जुड़ा है।

हाईकोर्ट ने सीबीआई को एफआईआर की सत्यता की जांच करने के साथ ही तत्कालीन थाना प्रभारी अश्विनी कुमार दुबे की निशानेबाजी क्षमता की भी जांच करने को कहा है। जांच में यह देखा जाएगा कि क्या वह रात के समय करीब 15 मीटर की दूरी से केवल हथियार लोड किए जाने की आवाज सुनकर 9 एमएम सर्विस पिस्टल से सटीक निशाना लगाकर आरोपी के दोनों पैरों में गोली मार सकते थे।

कोर्ट ने 9 एमएम की गोली से मेडिकल रिपोर्ट में बताए गए घावों के आकार को लेकर थाना प्रभारी की ओर से दिए गए स्पष्टीकरण पर भी सवाल उठाए हैं।

23 पुलिसकर्मियों की टीम पर भी सवाल

मामला उस कथित मुठभेड़ का है, जिसमें अलाउद्दीन के दोनों पैरों में गोली लगी थी। पुलिस का दावा था कि अलाउद्दीन ने 23 सदस्यीय पुलिस टीम पर फायरिंग की थी। थाना प्रभारी के मुताबिक, उन्हें हथियार लोड किए जाने की आवाज सुनाई दी, जिसके बाद आत्मरक्षा में उन्होंने दो गोलियां चलाईं और दोनों गोलियां आरोपी के पैरों में लगीं।

वहीं, अलाउद्दीन के अधिवक्ता ने पुलिस की इस कहानी पर कई सवाल खड़े किए। एफआईआर के मुताबिक 13 पुलिसकर्मी एक ही सरकारी वाहन में सवार थे और बाद में तीन टीमों में बंट गए। फर्द में किसी अन्य वाहन का उल्लेख नहीं था। इसके बाद 10 सदस्यीय स्वॉट टीम भी मौके पर पहुंची, जिससे मौके पर पुलिसकर्मियों की संख्या 23 हो गई।

ई-रिक्शा पर सवार व्यक्ति को रोकने में 23 पुलिसकर्मी कैसे रहे नाकाम?

सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने सवाल उठाया कि 10 स्वॉट कर्मियों समेत 23 सशस्त्र पुलिसकर्मी एक ई-रिक्शा पर सवार व्यक्ति को रोकने में कैसे असफल रहे।

अधिवक्ता ने यह भी दलील दी कि एक देसी तमंचा और दो कारतूस रखने वाले व्यक्ति से निपटने के लिए पुलिस टीम का कथित तौर पर छिपना और अतिरिक्त बल बुलाना समझ से परे है। कोर्ट ने भी पुलिस की कार्रवाई और घटनाक्रम को लेकर कई सवाल उठाए।

कथित इकबालिया बयान पर भी हाईकोर्ट ने जताया संदेह

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने गोली लगने के बाद अलाउद्दीन से कराए गए कथित इकबालिया बयान पर भी सवाल उठाए। कोर्ट के सामने यह तथ्य रखा गया कि सात वर्षीय बच्ची के अपहरण से जुड़ी मूल घटना के करीब 61 मिनट के भीतर एफआईआर दर्ज कर दी गई थी।

हालांकि, एफआईआर में दुष्कर्म, रक्तस्राव या बच्ची के घायल होने जैसी बातों का कोई उल्लेख नहीं था। ये बातें बाद में कथित इकबालिया बयान में सामने आईं।

हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना कि पुलिस की ओर से संभवत: झूठा इकबालिया बयान दर्ज किया गया था।

मुठभेड़ में शामिल सभी पुलिसकर्मी हुए थे पुरस्कृत

कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि कथित मुठभेड़ में शामिल सभी 23 पुलिसकर्मियों को अच्छे कार्य के लिए पुरस्कृत किया गया था। इनमें आरोपी से कथित इकबालिया बयान हासिल करने का काम भी शामिल था, जबकि संबंधित अपराध में अलाउद्दीन को पहले ही बरी किया जा चुका था।

हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस मुठभेड़ों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट की ओर से तय दिशा-निर्देश मौजूद हैं, लेकिन मौजूदा मामले में गंभीर चोट वाले पुलिस मुठभेड़ मामलों की जांच के लिए निर्धारित प्रक्रिया का प्रथम दृष्टया पालन होता नजर नहीं आया।

सेशन कोर्ट के आदेश पर भी रोक

हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को राहत देते हुए श्रावस्ती की सेशन कोर्ट के 2 जुलाई के उस आदेश के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी, जिसमें अलाउद्दीन की डिस्चार्ज अर्जी खारिज कर दी गई थी।

अब सीबीआई इस पूरे मामले की जांच करेगी और हाईकोर्ट ने उसे यथासंभव तीन महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 23 नवंबर को होगी।