UP Panchayat Election: पंचायत चुनाव में देरी पर हाईकोर्ट सख्त, कहा-सरकार नवंबर 2026 तक कराए इलेक्शन
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव को लेकर सियासी और कानूनी हलचल तेज हो गई है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने 5 अगस्त को सुनवाई के दौरान कहा कि राज्य सरकार पंचायत चुनाव कराने के लिए अधिकतम छह महीने की अवधि तक ही प्रशासनिक व्यवस्था चला सकती है। यह अवधि नवंबर 2026 में समाप्त हो रही है। कोर्ट ने सरकार से रिकॉर्ड भी तलब किया है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि चुनाव में देरी किसी ऐसी परिस्थिति के कारण हुई जो सरकार के नियंत्रण से बाहर थी या समय पर चुनाव कराने की जिम्मेदारी पूरी नहीं की गई।
इस टिप्पणी के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यूपी में पंचायत चुनाव नवंबर 2026 तक हो पाएंगे और क्या 2027 विधानसभा चुनाव से पहले गांवों की सरकार के लिए मतदान होगा?
क्यों समय पर नहीं हो सके पंचायत चुनाव?
सरकार ने हाईकोर्ट में चुनाव में देरी के पीछे प्रशासनिक कारण बताए हैं। राज्य निर्वाचन आयोग ने अंतिम मतदाता सूची 10 जून 2026 को प्रकाशित की। इसके अलावा पंचायत चुनाव में आरक्षण तय करने के लिए गठित पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट भी जरूरी है। सरकार का कहना है कि रिपोर्ट तैयार होने में समय लग रहा है। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषक इसके पीछे चुनावी समीकरणों को भी एक अहम वजह मानते हैं। 2021 के पंचायत चुनाव में भाजपा को अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी।
जिला पंचायत सदस्य की 3050 सीटों में भाजपा को 768 सीटें मिली थीं, जबकि सपा ने 759, बसपा ने 319, कांग्रेस ने 125 और निर्दलीय उम्मीदवारों ने 944 सीटें जीती थीं।
इसके बाद 2022 के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा की सीटों में गिरावट आई। ऐसे में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पंचायत चुनाव का परिणाम राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
NDA के सहयोगी दल भी बढ़ा सकते हैं भाजपा की चुनौती
पंचायत चुनाव को लेकर भाजपा के सहयोगी दलों के अलग-अलग रुख ने भी राजनीतिक समीकरणों को दिलचस्प बना दिया है। सुभासपा, निषाद पार्टी और अपना दल (एस) के अपने दम पर चुनाव लड़ने की चर्चाओं के बीच स्थानीय स्तर पर वोटों के बंटवारे की संभावना जताई जा रही है।
पूर्वांचल में अपना दल, निषाद पार्टी और सुभासपा का प्रभाव माना जाता है, जबकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में RLD की पकड़ है। यदि सहयोगी दल अलग-अलग चुनाव लड़ते हैं तो इसका असर भाजपा के स्थानीय संगठन और आगामी विधानसभा चुनाव की रणनीति पर भी पड़ सकता है।
गुटबाजी का भी डर
पंचायत चुनाव पार्टी के चुनाव चिह्न पर नहीं होते। ऐसे में एक ही राजनीतिक दल से जुड़े कई स्थानीय नेता और कार्यकर्ता एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव मैदान में उतर सकते हैं। इससे स्थानीय स्तर पर गुटबाजी बढ़ने और विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी संगठन में खींचतान पैदा होने की आशंका रहती है। यही वजह है कि पंचायत चुनाव का समय 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियों के लिहाज से भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
किस-किस पंचायत का कार्यकाल खत्म हो चुका है?
यूपी में ग्राम प्रधानों का कार्यकाल 26 मई 2026, जिला पंचायतों का 11 जुलाई और क्षेत्र पंचायतों का 19 जुलाई 2026 को समाप्त हो चुका है। चुनाव नहीं होने के कारण सरकार ने प्रधानों और अध्यक्षों के स्थान पर अगले छह महीने के लिए प्रशासकों की नियुक्ति की है।
इसी व्यवस्था को लेकर हाईकोर्ट में कई याचिकाएं दाखिल हैं। याचिकाओं में संविधान के अनुच्छेद 243-E और उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम, 1947 की धारा 12(3-A) का हवाला दिया गया है।
संविधान के अनुसार पंचायत का सामान्य कार्यकाल पांच वर्ष का होता है और कार्यकाल समाप्त होने से पहले चुनाव कराया जाना चाहिए। राज्य के कानून में भी चुनाव नहीं हो पाने की स्थिति में सीमित अवधि के भीतर चुनाव कराने का प्रावधान है।
क्या नवंबर में पंचायत चुनाव हो सकते हैं?
यही सबसे बड़ा पेच है। हाईकोर्ट की टिप्पणी के मुताबिक प्रशासकीय व्यवस्था को नवंबर 2026 से आगे बढ़ाना आसान नहीं होगा। लेकिन पंचायत चुनाव के लिए आरक्षण प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है।
राज्य सरकार ने 20 मई को पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया था। आयोग को पंचायत चुनाव के लिए आरक्षण से संबंधित रिपोर्ट तैयार करनी है। आयोग के अध्यक्ष जस्टिस (रिटायर्ड) राम औतार सिंह के अनुसार सभी 75 जिलों में दौरा, डेटा संग्रह और अध्ययन की प्रक्रिया दिसंबर 2026 तक चल सकती है। इसके बाद रिपोर्ट तैयार करने में करीब दो महीने लगने की बात कही गई है।
अगर यह समयसीमा कायम रहती है तो अंतिम रिपोर्ट फरवरी 2027 के आसपास आ सकती है। ऐसे में पंचायत चुनाव और 2027 विधानसभा चुनाव की समय-सारिणी आपस में टकरा सकती है।
क्या विधानसभा चुनाव से पहले पंचायत चुनाव होंगे?
फिलहाल इसकी तस्वीर साफ नहीं है। एक तरफ हाईकोर्ट नवंबर 2026 की छह महीने की सीमा को लेकर सख्त है, वहीं दूसरी ओर आरक्षण प्रक्रिया पूरी होने में समय लगने की बात सामने आ रही है।
यदि सरकार समयसीमा बढ़ाने की मांग करती है और हाईकोर्ट उसकी दलीलों से संतुष्ट नहीं होता, तो अदालत चुनाव कराने का आदेश दे सकती है। इसके बाद राज्य सरकार के पास सुप्रीम कोर्ट जाने का विकल्प भी रहेगा।