योगी सरकार का नया टेक्नोलॉजी प्लान, माइक्रोबायोम तकनीक को बढ़ावा देने की तैयारी, स्वास्थ्य से पर्यावरण तक होंगे नए प्रयोग
उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने, खेती की चुनौतियों से निपटने और पर्यावरण संरक्षण के लिए नईपरीक्षणों के जरिए यह समझने की कोशिश होगी कि इन सूक्ष्मजीवों की मदद से मिट्टी की गुणवत्ता और फसलों के विकास को किस तरह बेहतर बनाया जा सकता है। साथ ही, फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कारकों की पहचान और टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने की संभावनाओं पर भी काम किया जाएगा।
हालांकि, किसानों को इससे कितना लाभ मिलेगा, यह परीक्षणों के नतीजों पर निर्भर करेगा।
क्या है माइक्रोबायोम तकनीक?
माइक्रोबायोम किसी खास वातावरण में मौजूद सूक्ष्मजीवों के समुदाय और उनके आपसी संबंधों का अध्ययन है। इसमें बैक्टीरिया, फंगस और दूसरे सूक्ष्मजीव शामिल होते हैं, जो मानव शरीर, मिट्टी, पानी और पौधों में पाए जाते हैं।
कुछ सूक्ष्मजीव बीमारियों का कारण बन सकते हैं, जबकि कई पाचन, मिट्टी की उर्वरता, पोषक तत्वों के चक्र और जैविक कचरे के विघटन जैसी महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं में मदद करते हैं।
उत्तर प्रदेश सरकार की प्रस्तावित योजना का मकसद इसी वैज्ञानिक जानकारी का इस्तेमाल करके स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने, खेती को अधिक टिकाऊ बनाने और पर्यावरण से जुड़ी समस्याओं के समाधान तलाशने में करना है। फिलहाल, यह पहल मसौदे के स्तर पर है और इसके वास्तविक परिणाम मंजूरी, पायलट परियोजनाओं तथा उनके मूल्यांकन के बाद ही सामने आएंगे। तकनीक के इस्तेमाल की तैयारी है। योगी सरकार माइक्रोबायोम तकनीक को बढ़ावा देने की योजना बना रही है। इसके जरिए अस्पतालों में संक्रमण की निगरानी, दूषित पानी के उपचार और फसलों की गुणवत्ता सुधारने जैसे क्षेत्रों में नए प्रयोग किए जा सकते हैं। इस संबंध में सरकार ने एक मसौदा तैयार किया है। फिलहाल, योजना को चुनिंदा स्थानों पर पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर शुरू करने का प्रस्ताव है।
स्वास्थ्य, खेती और पर्यावरण पर रहेगा फोकस
सरकार की ओर से तैयार किए गए ‘उत्तर प्रदेश स्टेट स्पेसिफिक नोट ऑन माइक्रोबायोम टेक्नोलॉजीज’ में इस तकनीक के विभिन्न क्षेत्रों में इस्तेमाल की संभावनाओं पर जोर दिया गया है। इसका उद्देश्य सूक्ष्मजीवों से जुड़ी वैज्ञानिक जानकारी का उपयोग करके स्वास्थ्य सेवाओं, खाद्य सुरक्षा, स्वच्छता और टिकाऊ खेती को बेहतर बनाना है।
प्रस्ताव के तहत अस्पतालों में संक्रमण की पहचान, एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस यानी रोगाणुओं में दवाओं के प्रति प्रतिरोध की निगरानी, दूषित पानी का उपचार और कचरा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में काम किया जाएगा। इसके साथ ही कृषि क्षेत्र में भी इस तकनीक के इस्तेमाल की संभावनाएं तलाशी जाएंगी।
बायोटेक्नोलॉजी पार्क और विशेषज्ञ निभाएंगे अहम भूमिका
इस पहल को आगे बढ़ाने के लिए लखनऊ स्थित बायोटेक्नोलॉजी पार्क और संबंधित संस्थानों की भागीदारी प्रस्तावित है। उत्तर प्रदेश प्रमोट फार्मा काउंसिल की सीईओ कृतिका शर्मा के मुताबिक, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मंशा विज्ञान और तकनीक के जरिए अलग-अलग क्षेत्रों में नए प्रयोगों को बढ़ावा देने की है। इसी उद्देश्य से यह मसौदा तैयार किया गया है।
मसौदे को मुख्यमंत्री के सामने प्रस्तुत किया जाएगा। वहां से मंजूरी मिलने के बाद ही योजना को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया शुरू होगी।
दो साल में चरणबद्ध तरीके से लागू करने की तैयारी
प्रस्तावित योजना को अगले दो वर्षों में अलग-अलग चरणों में आगे बढ़ाने की तैयारी है। पहले तीन महीनों में प्रयोगशालाओं की मौजूदा क्षमता का आकलन किया जाएगा। साथ ही, संबंधित विभागों के साथ चर्चा कर पायलट प्रोजेक्ट के लिए उपयुक्त स्थान चुने जाएंगे।
चौथे से 12वें महीने के बीच अस्पतालों में संक्रमण की निगरानी, दूषित पानी की जांच और कृषि से जुड़ी परियोजनाओं पर काम करने का प्रस्ताव है। इसके बाद 13वें से 24वें महीने तक अलग-अलग मौसम और फसल चक्र के आधार पर परियोजनाओं के नतीजों का मूल्यांकन किया जाएगा। प्रयोग सफल रहने पर इन्हें बड़े स्तर पर लागू करने पर विचार किया जा सकता है।
अस्पतालों में संक्रमण और दवाओं के असर की होगी निगरानी
मसौदे में विशेषज्ञ डॉ. जीएन सिंह ने सरकारी और चुनिंदा निजी अस्पतालों के नेटवर्क के जरिए संक्रमण तथा एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस की निगरानी का सुझाव दिया है।
इसके लिए सामान्य लैब जांच के अलावा जरूरत पड़ने पर जीन आधारित परीक्षण और डीएनए सीक्वेंसिंग जैसी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे संक्रमण फैलाने वाले सूक्ष्मजीवों की पहचान करने और यह समझने में मदद मिलेगी कि बैक्टीरिया में दवाओं के प्रति प्रतिरोध किस तरह विकसित हो रहा है। इससे संक्रमण के प्रसार को समझने और उसकी रोकथाम की रणनीति बनाने में भी मदद मिल सकती है।
गंगा, यमुना और गोमती के पानी की सफाई पर भी नजर
इस पहल में पर्यावरण संरक्षण को भी अहम स्थान दिया गया है। प्रस्ताव के तहत गंगा, यमुना और गोमती के जलग्रहण क्षेत्रों में पायलट परियोजनाएं शुरू करने का सुझाव दिया गया है।
इन परियोजनाओं में जल शोधन संयंत्रों में मौजूद सूक्ष्मजीवों की कार्यक्षमता का अध्ययन किया जाएगा। इसके साथ ही ऑक्सीजन की उपलब्धता, पोषक तत्वों के संतुलन और जहरीले पदार्थों के प्रभाव जैसे पहलुओं पर भी ध्यान दिया जाएगा।
इसका उद्देश्य जैविक प्रक्रियाओं के जरिए पानी की सफाई को अधिक प्रभावी बनाने की संभावनाएं तलाशना है। हालांकि, इससे नदियों के प्रदूषण में कितनी कमी आएगी, यह परियोजनाओं के परिणाम सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगा।
किसानों को कैसे मिल सकता है फायदा?
माइक्रोबायोम तकनीक का इस्तेमाल खेती में भी किया जा सकता है। इसके तहत मिट्टी में मौजूद उपयोगी सूक्ष्मजीवों का अध्ययन किया जाएगा, जो मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने और पौधों तक पोषक तत्व पहुंचाने में भूमिका निभाते हैं।