महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर सजा राग-विराग का मेला, धधकती चिताओं के बीच गणिकाओं ने अर्पित की नृत्यांजलि
वाराणसी: आमतौर पर श्मशान घाट पर मातम का माहोल देखेने को मिलता है, लेकिन चैत्र नवरात्र की तिथि सप्तमी तिथि की रात महाश्मशान मणिकर्णिका घाट (Manikarnika Ghat) पर एक ऐसी अनोखी परंपरा निभाई जाती है, जिसे देखने के लिए हर साल बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं। यहां जलती चिताओं के बीच नगर वधुएं पूरी रात नृत्य कर भगवान शिव को अपनी नृत्यांजलि अर्पित करती हैं। मान्यता है कि इस परंपरा के माध्यम से वे अपने जीवन और अगले जन्म को बेहतर बनाने की कामना करती हैं।
भक्ति, संगीत और नृत्य का संगम
नवरात्र की सप्तमी तिथि की रात मणिकर्णिका घाट पर भक्ति और संगीत का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। नगर वधुएं “दुर्गा दुर्गति नाशिनी, ओम नमः शिवाय, बम लहरी जैसे भजनों पर नृत्य प्रस्तुत करती हैं। इसके साथ ही दादरा, ठुमरी और चैती गाकर बाबा के चरणों में अपनी गीतांजलि अर्पित करती हैं।
पूरी रात चलने वाले इस जागरण में श्रद्धालु भी झूम उठते हैं और घाट का माहौल आध्यात्मिक ऊर्जा से भर जाता है।
350 साल पुरानी परंपरा
काशी के महाश्मशान से जुड़ी यह परंपरा करीब 350 वर्षों से भी अधिक पुरानी मानी जाती है। धार्मिक मान्यता है कि मणिकर्णिका घाट पर किया गया हर शुभ कार्य मोक्ष की राह खोलता है। इसी विश्वास के साथ नगर वधुएं यहां आकर नृत्य के जरिए भगवान से मुक्ति की प्रार्थना करती हैं।
राजा मानसिंह के समय से हुई शुरुआत
इस परंपरा की शुरुआत Raja Man Singh के समय मानी जाती है। कहा जाता है कि जब बाबा के मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया, तब मंदिर में संगीत कार्यक्रम के लिए कोई भी कलाकार आने को तैयार नहीं था। हिंदू परंपरा में पूजा-पाठ में संगीत का विशेष महत्व होता है, ऐसे में यह चिंता का विषय बन गया।
नगर वधुओं ने संभाली परंपरा
जब कोई कलाकार आगे नहीं आया, तो काशी की नगर वधुओं ने खुद आगे बढ़कर यह जिम्मेदारी संभाली। उन्होंने राजा मानसिंह से अनुमति मांगी और कहा कि वे अपने आराध्य नटराज को नृत्य अर्पित करना चाहती हैं। उनकी भावना को देखते हुए उन्हें अनुमति दी गई और तभी से यह परंपरा लगातार चली आ रही है।
आज भी निभाई जाती है यह परंपरा
आज भी नगर वधुएं, चाहे वे कहीं भी हों, चैत्र नवरात्र के दौरान काशी पहुंचकर इस परंपरा को निभाती हैं। उनका विश्वास है कि इस अनोखी साधना से उन्हें जीवन के कष्टों से मुक्ति मिलेगी और मोक्ष की प्राप्ति होगी।
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