Devshayani Ekadashi 2026: भगवान कृष्ण ने युधिष्ठिर को सुनाई थी देवशयनी एकादशी की पौराणिक कथा, जानें व्रत का महत्व
Devshayani Ekadashi 2026: हिंदू धर्म में देवशयनी एकादशी का विशेष महत्व माना गया है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत रखने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है और साधक की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इस वर्ष देवशयनी एकादशी का व्रत 25 जुलाई 2026 को रखा जाएगा। इसी दिन से चार महीने तक चलने वाले चातुर्मास की शुरुआत होती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु इस दिन क्षीरसागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं और देवउठनी (देवप्रबोधिनी) एकादशी के दिन जागते हैं।
ब्रह्म वैवर्त पुराण में बताया गया है व्रत का महत्व
ब्रह्म वैवर्त पुराण में देवशयनी एकादशी को अत्यंत पुण्यदायी बताया गया है। कहा गया है कि जो व्यक्ति इस व्रत को श्रद्धा और विधि-विधान से करता है, उसके जीवन के कष्ट दूर होते हैं और सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है। यही कारण है कि इस एकादशी का विशेष महत्व माना जाता है।
भगवान कृष्ण ने युधिष्ठिर को सुनाई थी यह कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा कि आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या महत्व है, इसका व्रत कैसे किया जाता है और इस दिन किस देवता की पूजा करनी चाहिए।
इस पर भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि वे वही कथा सुना रहे हैं, जिसे स्वयं ब्रह्माजी ने नारद मुनि को बताया था।
राजा मांधाता के राज्य में पड़ा भीषण अकाल
सतयुग में राजा मांधाता नाम के एक धर्मपरायण और न्यायप्रिय चक्रवर्ती सम्राट थे। उनके राज्य में प्रजा सुखी थी, लेकिन एक समय ऐसा आया जब लगातार तीन वर्षों तक वर्षा नहीं हुई। पूरे राज्य में भयंकर अकाल पड़ गया और लोग अन्न तथा जल के लिए परेशान होने लगे।
राजा मांधाता इस संकट का कारण समझ नहीं पाए। उन्हें लगा कि शायद उनसे कोई ऐसा अपराध हुआ है, जिसकी सजा पूरी प्रजा को भुगतनी पड़ रही है। समाधान की तलाश में वे अपने सैनिकों के साथ जंगल पहुंचे और वहां ब्रह्माजी के पुत्र महर्षि अंगिरा के आश्रम में पहुंचे।
महर्षि अंगिरा ने बताया अकाल का कारण
राजा ने महर्षि अंगिरा से अकाल का कारण पूछा। महर्षि ने बताया कि सतयुग में धर्म की मर्यादा का विशेष महत्व था। उस समय एक शूद्र कठोर तपस्या कर रहा था, जिसे उस युग की व्यवस्था के विपरीत माना गया। इसी कारण राज्य में वर्षा रुक गई। हालांकि, राजा मांधाता किसी निर्दोष तपस्वी की हत्या करने को तैयार नहीं हुए। उन्होंने महर्षि से कोई दूसरा उपाय बताने का आग्रह किया।
देवशयनी एकादशी व्रत से दूर हुआ संकट
महर्षि अंगिरा ने राजा को आषाढ़ शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी का व्रत रखने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि यदि राजा पूरी श्रद्धा और विधि-विधान से यह व्रत करेंगे, तो भगवान विष्णु की कृपा से राज्य में वर्षा होगी।
राजा मांधाता ने अपनी पूरी प्रजा के साथ मिलकर देवशयनी एकादशी का व्रत किया। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस व्रत के प्रभाव से शीघ्र ही राज्य में अच्छी वर्षा हुई, अकाल समाप्त हो गया और राज्य में फिर से सुख, समृद्धि और खुशहाली लौट आई।
चातुर्मास की शुरुआत का प्रतीक
देवशयनी एकादशी केवल एक व्रत नहीं, बल्कि चातुर्मास की शुरुआत का भी प्रतीक है। इस अवधि में भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं। धार्मिक परंपराओं के अनुसार इन चार महीनों में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे मांगलिक कार्य नहीं किए जाते, जबकि पूजा, जप, तप, दान और भक्ति का विशेष महत्व माना जाता है।
Disclaimer: यह जानकारी धार्मिक ग्रंथों, पौराणिक मान्यताओं और लोक परंपराओं पर आधारित है। विभिन्न मान्यताओं में कथाओं और विधियों में अंतर हो सकता है।