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Hariyali Teej 2026: 108 साल की तपस्या के बाद शिव ने पार्वती को बनाया पत्नी, जानें हरियाली तीज की पूरी पौराणिक कथा

हरियाली तीज की पौराणिक कथा भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य मिलन से जुड़ी है। धार्मिक मान्यता के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए 108 वर्षों तक कठोर तपस्या की थी। जानिए हरियाली तीज की कथा, व्रत का महत्व, हरे रंग और तीज की परंपराएं।
 

Hariyali Teej 2026: हरियाली तीज महिलाओं के प्रमुख त्योहारों में से एक है। सावन में मनाए जाने वाले इस पर्व पर महिलाएं व्रत रखती हैं, सोलह श्रृंगार करती हैं और भगवान शिव व माता पार्वती की विधि-विधान से पूजा करती हैं। हरे रंग के कपड़े, हरी चूड़ियां और मेहंदी इस पर्व की खास पहचान हैं। धार्मिक मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव ने माता पार्वती को पत्नी के रूप में स्वीकार किया था। आइए जानते हैं हरियाली तीज से जुड़ी पौराणिक कथा।

हरियाली तीज पर क्यों रखा जाता है व्रत?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार हरियाली तीज पति-पत्नी के बीच प्रेम, विश्वास और वैवाहिक सुख का प्रतीक मानी जाती है। इस दिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, सुखी दांपत्य जीवन और परिवार की खुशहाली की कामना से व्रत रखती हैं। कई स्थानों पर महिलाएं इस दिन सोलह श्रृंगार कर माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा करती हैं। हरे रंग के वस्त्र और हरी चूड़ियां पहनने का भी विशेष महत्व माना जाता है।

भगवान शिव को पति बनाना चाहती थीं माता पार्वती

हरियाली तीज की पौराणिक कथा के अनुसार, माता पार्वती बचपन से ही भगवान शिव को अपने पति के रूप में पाना चाहती थीं। उन्होंने मन ही मन भगवान शिव को अपना जीवनसाथी मान लिया था और उन्हें पाने का संकल्प लिया था।

जब माता पार्वती विवाह योग्य हुईं तो उनके पिता पर्वतराज हिमालय ने उनके लिए योग्य वर की तलाश शुरू की। इसी दौरान नारद मुनि उनके घर पहुंचे और उन्होंने पर्वतराज हिमालय को माता पार्वती का विवाह भगवान विष्णु से कराने की सलाह दी।

विवाह की बात सुनकर परेशान हो गईं पार्वती

जब माता पार्वती को अपने विवाह की बात भगवान विष्णु से होने की जानकारी मिली तो वह बेहद दुखी हो गईं। वह भगवान शिव को ही अपना पति मानती थीं। इसके बाद उन्होंने भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए एकांत जंगल में जाकर कठोर तपस्या शुरू कर दी मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए 108 वर्षों तक कठोर तपस्या की।

108 साल की तपस्या के बाद मिला तप का फल

कथा के अनुसार, माता पार्वती को अपनी तपस्या पर पूरा विश्वास था। उन्होंने कठिन परिस्थितियों के बावजूद भगवान शिव की आराधना जारी रखी। लंबे समय तक तपस्या करने के बाद भगवान शिव माता पार्वती की भक्ति और समर्पण से प्रसन्न हुए।

इसके बाद भगवान शिव ने माता पार्वती को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया। धार्मिक मान्यता के अनुसार, शिव-पार्वती का यह दिव्य मिलन सावन महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हुआ था। इसी वजह से इस दिन को हरियाली तीज के रूप में मनाए जाने की मान्यता है।

हरियाली तीज से जुड़ी हैं कई मान्यताएं

कहा जाता है कि शिव-पार्वती के मिलन की स्मृति में महिलाएं हरियाली तीज पर व्रत और पूजा करती हैं। इस दिन माता पार्वती की आराधना कर महिलाएं अपने वैवाहिक जीवन में प्रेम, सुख और स्थिरता की कामना करती हैं। हालांकि, अलग-अलग क्षेत्रों में तीज से जुड़ी परंपराओं और मान्यताओं में अंतर भी देखने को मिलता है।

हरियाली तीज और हरतालिका तीज को लेकर क्यों है भ्रम?

हरियाली तीज और हरतालिका तीज दोनों ही भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित पर्व हैं, लेकिन दोनों की तिथि और परंपराएं अलग हैं। कुछ पौराणिक मान्यताओं में शिव-पार्वती के मिलन को भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया से जोड़ा जाता है। इसी तिथि पर हरतालिका तीज मनाई जाती है। कई क्षेत्रों में महिलाएं हरियाली तीज के बजाय हरतालिका तीज पर व्रत रखती हैं। यही वजह है कि अलग-अलग क्षेत्रों में तीज की कथा और व्रत से जुड़ी परंपराओं में कुछ अंतर देखने को मिलता है।

हरे रंग और सोलह श्रृंगार का क्या महत्व है?

हरियाली तीज सावन के मौसम में आती है, जब प्रकृति चारों ओर हरियाली से भर जाती है। इसी कारण इस पर्व पर हरे रंग को विशेष महत्व दिया जाता है। महिलाएं हरे रंग के कपड़े और चूड़ियां पहनती हैं तथा मेहंदी लगाती हैं। कई स्थानों पर तीज के अवसर पर झूला झूलने, लोकगीत गाने और सामूहिक रूप से पर्व मनाने की भी परंपरा है।

धार्मिक आस्था से जुड़ा है यह पर्व

हरियाली तीज केवल व्रत और पूजा का पर्व नहीं, बल्कि भारतीय परंपरा में महिलाओं के वैवाहिक सुख, प्रेम और पारिवारिक खुशहाली से जुड़ा त्योहार भी माना जाता है। हालांकि, इससे जुड़ी पौराणिक कथाएं और मान्यताएं धार्मिक आस्था एवं लोक परंपराओं पर आधारित हैं।

Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक कथाओं और लोक परंपराओं पर आधारित है। इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। BGT किसी भी धार्मिक मान्यता या दावे की सत्यता की पुष्टि नहीं करता है।