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राखी के कितने नाम हैं? जानिए भारत के अलग-अलग हिस्सों में कैसे मनाया जाता है रक्षाबंधन
 

 

Raksha Bandhan 2026: भारत में रक्षाबंधन सिर्फ भाई की कलाई पर राखी बांधने का त्योहार नहीं है। श्रावण पूर्णिमा के इस पर्व का देश के अलग-अलग हिस्सों में अपना अलग रंग, नाम और परंपरा है। कहीं बहन भाई की कलाई पर रक्षा-सूत्र बांधती है, तो कहीं समुद्र को नारियल अर्पित किए जाते हैं, कहीं पवित्र धागा बदला जाता है और कहीं पशुओं की पूजा की जाती है। यही विविधता रक्षाबंधन को भारत की सांस्कृतिक परंपराओं का अनोखा पर्व बनाती है।

सिर्फ ‘राखी’ नहीं है इस त्योहार की पहचान

आम तौर पर इसे रक्षाबंधन या राखी कहा जाता है। इसका मूल भाव रक्षा-सूत्र बांधने और भाई-बहन के स्नेह से जुड़ा है। लेकिन श्रावण पूर्णिमा का धार्मिक महत्व इससे कहीं व्यापक है।

भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में इसी अवसर पर अलग-अलग परंपराएं विकसित हुई हैं। इसलिए कई जगह इसे अलग नामों और स्थानीय रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है।

महाराष्ट्र में ‘नारली पूर्णिमा’

महाराष्ट्र के खासकर तटीय इलाकों में श्रावण पूर्णिमा को नारली पूर्णिमा के रूप में भी मनाया जाता है।

‘नारली’ का संबंध नारियल से है। इस दिन समुद्र से जुड़े समुदाय, विशेषकर कोली मछुआरे, समुद्र और भगवान वरुण की पूजा करते हैं तथा नारियल अर्पित करते हैं। परंपरा का संबंध सुरक्षित समुद्री यात्रा और मछली पकड़ने के नए मौसम की शुरुआत से भी जोड़ा जाता है। इसी दिन भाई-बहन रक्षाबंधन भी मनाते हैं।

यानी महाराष्ट्र के तटीय इलाकों में यह दिन भाई-बहन के रिश्ते के साथ समुद्र और आजीविका से भी जुड़ा हुआ है।

गुजरात में ‘पवित्रोपना’

गुजरात में इस दिन को पवित्रोपना नाम से भी जाना जाता है। यहां भगवान शिव की पूजा और मंदिरों में जल अर्पित करने की परंपरा का उल्लेख मिलता है। इसके साथ बहनें भाइयों की कलाई पर राखी बांधती हैं।

इस तरह यहां श्रावण पूर्णिमा का पर्व शिव आराधना और भाई-बहन के रिश्ते, दोनों से जुड़ जाता है।

उत्तराखंड में ‘जनेऊ बदलने’ की परंपरा

उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में श्रावण पूर्णिमा का एक महत्वपूर्ण नाम जनोपुन्यू या जंध्यम पूर्णिमा भी है।

यहां विशेष रूप से ब्राह्मण समुदाय में इस दिन जनेऊ यानी पवित्र धागा बदलने की परंपरा है। इसलिए यहां श्रावण पूर्णिमा का धार्मिक स्वरूप केवल भाई-बहन की राखी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आध्यात्मिक संकल्प और धार्मिक अनुष्ठान से भी जुड़ता है।

ओडिशा में ‘गम्हा पूर्णिमा’

ओडिशा में इसी दिन गम्हा पूर्णिमा मनाई जाती है।

इस अवसर पर गाय और बैलों को नहलाकर सजाया जाता है और उनकी पूजा की जाती है। ग्रामीण और कृषि समाज में पशुओं की भूमिका को देखते हुए यह पर्व उनके प्रति सम्मान और कृतज्ञता का प्रतीक माना जाता है। इस दिन परिवारों में पारंपरिक पकवान और मिठाइयां भी बनाई जाती हैं।

यानी ओडिशा में श्रावण पूर्णिमा का यह पर्व भाई-बहन के रिश्ते के साथ कृषि जीवन और पशुधन से भी जुड़ा दिखाई देता है।

राजस्थान में ‘लुंबा राखी’

राजस्थान और कई मारवाड़ी परिवारों में रक्षाबंधन की एक खास परंपरा लुंबा राखी है।

यहां बहन सिर्फ भाई की कलाई पर ही राखी नहीं बांधती, बल्कि कई परिवारों में भाई की पत्नी की चूड़ी या कंगन पर भी राखी बांधी जाती है। इसे लुंबा राखी कहा जाता है।

इसके पीछे विचार यह है कि विवाह के बाद भाई के जीवन और परिवार में उसकी पत्नी की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसलिए भाई-बहन के रिश्ते के इस पर्व में भाभी को भी शामिल किया जाता है।

पश्चिम बंगाल में ‘झूलन पूर्णिमा’

पश्चिम बंगाल में श्रावण पूर्णिमा झूलन यात्रा के समापन से भी जुड़ी है। भगवान कृष्ण और राधा की मूर्तियों को फूलों से सजे झूलों पर विराजमान कराया जाता है और भक्ति कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

इसलिए बंगाल में इस दिन का सांस्कृतिक रंग राखी के साथ कृष्ण-राधा की भक्ति और झूला उत्सव से भी जुड़ता है।

मध्य भारत में ‘कजरी पूर्णिमा’

उत्तर और मध्य भारत के कुछ क्षेत्रों में श्रावण पूर्णिमा से जुड़े पर्व को कजरी पूर्णिमा भी कहा जाता है। कृषि परंपरा वाले क्षेत्रों में इस अवसर का संबंध खेती और अच्छी फसल की कामना से जोड़ा जाता रहा है।

इससे पता चलता है कि भारत में श्रावण पूर्णिमा केवल पारिवारिक त्योहार नहीं रही, बल्कि अलग-अलग समाजों में इसका संबंध कृषि, धर्म, समुद्र, पशुधन और सामाजिक रिश्तों से भी रहा है।

दक्षिण भारत में ‘अवनि अवित्तम’

दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में श्रावण पूर्णिमा के आसपास अवनि अवित्तम मनाया जाता है। यह विशेष रूप से वैदिक परंपरा और पवित्र धागे से जुड़े धार्मिक अनुष्ठानों का पर्व है।

इस दिन जनेऊ बदलने और वैदिक मंत्रों के साथ धार्मिक अनुष्ठान करने की परंपरा कई समुदायों में महत्वपूर्ण है।

एक दिन, कई परंपराएं

रक्षाबंधन की सबसे खास बात यही है कि भारत के अलग-अलग हिस्सों में श्रावण पूर्णिमा का स्वरूप एक जैसा नहीं है।

कहीं यह भाई-बहन के प्रेम और रक्षा-संकल्प का पर्व है, कहीं समुद्र और भगवान वरुण की पूजा का दिन, कहीं पवित्र धागा बदलने का अवसर, तो कहीं गाय-बैल की पूजा और कृषि जीवन के प्रति कृतज्ञता का पर्व।

यही वजह है कि रक्षाबंधन को केवल एक रस्म या एक क्षेत्र का त्योहार मानना भारत की व्यापक सांस्कृतिक विविधता को छोटा कर देता है।

कलाई पर बंधा धागा, परंपराओं का रिश्ता

आज रक्षाबंधन की सबसे लोकप्रिय पहचान भाई की कलाई पर बहन द्वारा राखी बांधना है। पूजा, तिलक, आरती, मिठाई और भाई द्वारा बहन को उपहार देने की परंपरा इसके मुख्य हिस्से हैं। भारत सरकार के पर्यटन पोर्टल के अनुसार, ‘रक्षाबंधन’ का अर्थ ही ‘रक्षा का बंधन’ है और यह पर्व भाई-बहन के स्नेह और सुरक्षा की भावना का प्रतीक है।

लेकिन जब देश के अलग-अलग हिस्सों की परंपराओं को देखा जाता है तो समझ आता है कि एक ही पूर्णिमा कितनी अलग-अलग सांस्कृतिक कहानियां अपने भीतर समेटे हुए है।