{"vars":{"id": "130921:5012"}}

Nirjala Ekadashi 2026: क्यों कहा जाता है इसे भीमसेनी एकादशी? एक व्रत से मिलता है 24 एकादशियों का पुण्य

Nirjala Ekadashi 2026 को साल की सबसे बड़ी एकादशी माना जाता है। इसे भीमसेनी या पांडव एकादशी भी कहा जाता है। जानिए भीमसेन और महर्षि वेदव्यास से जुड़ी पौराणिक कथा, व्रत का धार्मिक महत्व, नियम और क्यों इस व्रत से 24 एकादशियों का पुण्य प्राप्त होता है।

 

Nirjala Ekadashi 2026: हिंदू धर्म में निर्जला एकादशी को सभी एकादशियों में सबसे महत्वपूर्ण और पुण्यदायी माना गया है। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली यह एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित होती है। इस दिन श्रद्धालु केवल अन्न ही नहीं, बल्कि जल का भी त्याग करते हैं। यही कारण है कि इसे निर्जला एकादशी कहा जाता है।

धार्मिक मान्यता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा और नियमपूर्वक निर्जला एकादशी का व्रत करता है, उसे वर्षभर आने वाली सभी 24 एकादशियों के व्रत के बराबर पुण्य प्राप्त होता है। यही वजह है कि इसे भीमसेनी एकादशी और पांडव एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।

क्यों कहा जाता है इसे भीमसेनी एकादशी?

निर्जला एकादशी के पीछे महाभारत काल से जुड़ी एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा प्रचलित है। कथा के अनुसार पांडवों की माता कुंती, धर्मराज युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल, सहदेव और द्रौपदी वर्षभर आने वाली सभी एकादशियों का व्रत रखते थे। वे भीमसेन को भी व्रत रखने के लिए प्रेरित करते थे, लेकिन भीम अपनी अत्यधिक भूख के कारण नियमित उपवास नहीं कर पाते थे।

अपनी समस्या का समाधान खोजने के लिए भीमसेन महर्षि वेदव्यास के पास पहुंचे। उन्होंने महर्षि से कहा कि उनके लिए महीने में दो बार उपवास रखना संभव नहीं है, इसलिए कोई ऐसा उपाय बताया जाए जिससे धार्मिक लाभ भी मिल सके।

तब महर्षि वेदव्यास ने भीमसेन को ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी पर निर्जला व्रत रखने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि इस व्रत में सूर्योदय से अगले दिन सूर्योदय तक अन्न और जल दोनों का त्याग करना होगा। केवल आचमन के लिए जल ग्रहण किया जा सकता है।

महर्षि ने बताया कि यदि कोई व्यक्ति पूरे नियम और श्रद्धा से यह व्रत करता है तो उसे वर्षभर की सभी एकादशियों के व्रत का फल प्राप्त होता है। भीमसेन ने उनके निर्देशानुसार यह कठिन व्रत रखा और पूर्ण पुण्य प्राप्त किया। तभी से यह तिथि भीमसेनी एकादशी के नाम से प्रसिद्ध हो गई।

निर्जला एकादशी का धार्मिक महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार निर्जला एकादशी का व्रत विशेष फलदायी माना गया है।

  • इस व्रत को करने से व्यक्ति को उसके पापों से मुक्ति मिलती है।
  • भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
  • वर्षभर की सभी एकादशियों के बराबर पुण्य फल मिलता है।
  • मृत्यु के बाद वैकुंठ धाम की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
  • मन, वचन और कर्म की शुद्धि के लिए यह व्रत अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

व्रत में क्यों नहीं पिया जाता जल?

निर्जला एकादशी का सबसे कठिन नियम जल का त्याग है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह व्रत आत्मसंयम, तपस्या और भगवान विष्णु के प्रति पूर्ण समर्पण का प्रतीक माना जाता है। इसलिए श्रद्धालु पूरे दिन और रात बिना जल ग्रहण किए व्रत का पालन करते हैं।

श्रद्धा और संयम का महापर्व

निर्जला एकादशी केवल एक धार्मिक व्रत नहीं, बल्कि आत्मसंयम, आस्था और भक्ति की परीक्षा भी मानी जाती है। यही कारण है कि इसे वर्ष की सबसे महत्वपूर्ण एकादशी का दर्जा प्राप्त है। लाखों श्रद्धालु इस दिन भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना कर सुख, समृद्धि और मोक्ष की कामना करते हैं।

Disclaimer: यह जानकारी धार्मिक आस्थाओं और पौराणिक मान्यताओं पर आधारित है। विभिन्न परंपराओं और क्षेत्रों में मान्यताओं में अंतर हो सकता है। बेनारस ग्लोबल टाइम्स इसकी पूर्ण सत्यता का दावा नहीं करता।