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आज सावन सोमवार के साथ सोम प्रदोष का संयोग, जानें पूजा मुहूर्त और प्रदोष व्रत कथा

सावन के दूसरे सोमवार यानी 10 अगस्त 2026 को सोम प्रदोष व्रत का दुर्लभ संयोग बन रहा है। प्रदोष काल शाम 7:05 से रात 9:14 बजे तक रहेगा। जानें सोम प्रदोष पूजा का शुभ मुहूर्त, धार्मिक महत्व और ब्राह्मणी-राजकुमार से जुड़ी पौराणिक प्रदोष व्रत कथा।
 

Som Pradosh 2026: सावन के दूसरे सोमवार यानी 10 अगस्त 2026 को इस बार सोम प्रदोष व्रत का विशेष संयोग बन रहा है। सोमवार और प्रदोष व्रत के एक साथ पड़ने से धार्मिक दृष्टि से इस दिन का महत्व और बढ़ गया है। पंचांग के अनुसार, आज प्रदोष काल में भगवान शिव की पूजा के लिए शाम 7:05 बजे से रात 9:14 बजे तक का समय रहेगा। मान्यता है कि इस अवधि में विधि-विधान से शिव पूजा और सोम प्रदोष व्रत की कथा का श्रवण करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है।

शाम 7:05 से 9:14 बजे तक रहेगा प्रदोष काल

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार प्रदोष काल भगवान शिव की आराधना के लिए विशेष माना जाता है। आज सावन सोमवार के साथ सोम प्रदोष का संयोग होने के कारण शिव भक्तों के लिए यह दिन खास है। श्रद्धालु प्रदोष काल में भगवान शिव का पूजन, अभिषेक और विधि-विधान से आराधना कर सकते हैं।

मान्यता है कि सोम प्रदोष व्रत रखने वाले भक्तों को पूजा के साथ इसकी कथा भी सुननी चाहिए। इसी से व्रत का धार्मिक विधान पूरा माना जाता है। इसी मान्यता से जुड़ी सोम प्रदोष व्रत की एक पौराणिक कथा भी प्रचलित है।

ब्राह्मणी और राजकुमार की कहानी से जुड़ी है प्रदोष व्रत कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, एक नगर में एक ब्राह्मणी अपने बेटे के साथ रहती थी। उसके पति का निधन हो चुका था। परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी थी कि वह प्रतिदिन अपने पुत्र के साथ भिक्षा मांगकर जीवनयापन करती थी।

एक दिन घर लौटते समय ब्राह्मणी को रास्ते में एक घायल बालक मिला। उसने दया दिखाते हुए उसे अपने घर ले जाकर आश्रय दिया। ब्राह्मणी को उस समय यह जानकारी नहीं थी कि वह बालक विदर्भ का राजकुमार है।

कथा के अनुसार, शत्रु सैनिकों ने विदर्भ पर हमला कर राजकुमार के पिता को बंदी बना लिया था और राज्य पर कब्जा कर लिया था। इसके बाद राजकुमार अपना घर-राज्य छोड़कर भटक रहा था।

राजकुमार पर मोहित हुई अंशुमति

राजकुमार कुछ समय तक ब्राह्मणी के घर रहने लगा। इसी दौरान अंशुमति नाम की एक गंधर्व कन्या की नजर उस पर पड़ी और वह राजकुमार से प्रभावित हो गई। अगले दिन अंशुमति अपने माता-पिता के साथ राजकुमार से मिलने पहुंची।

राजकुमार उन्हें भी पसंद आया। कुछ समय बाद अंशुमति के माता-पिता को स्वप्न में भगवान शिव के दर्शन हुए। मान्यता के अनुसार भगवान शिव ने उन्हें राजकुमार और अंशुमति का विवाह कराने का निर्देश दिया। इसके बाद दोनों का विवाह कर दिया गया।

प्रदोष व्रत के प्रभाव से राजकुमार को मिला राज्य

कथा में बताया गया है कि ब्राह्मणी नियमित रूप से प्रदोष व्रत किया करती थी। उसके व्रत के प्रभाव और गंधर्वराज की सेना की सहायता से राजकुमार ने विदर्भ में अपने शत्रुओं को पराजित किया और अपना खोया हुआ राज्य वापस प्राप्त कर लिया।

राज्य वापस मिलने के बाद राजकुमार ने ब्राह्मणी के पुत्र को अपना प्रधानमंत्री बना लिया। इस तरह प्रदोष व्रत के माहात्म्य से राजकुमार और ब्राह्मणी के पुत्र दोनों के जीवन में सुख-समृद्धि लौट आई।

क्या है सोम प्रदोष का धार्मिक महत्व?

धार्मिक मान्यताओं में सोमवार को भगवान शिव को समर्पित दिन माना जाता है, जबकि त्रयोदशी तिथि पर प्रदोष व्रत रखा जाता है। जब प्रदोष व्रत सोमवार के दिन पड़ता है तो इसे सोम प्रदोष कहा जाता है।

मान्यता है कि सोम प्रदोष के दिन भगवान शिव की आराधना करने से भक्तों के जीवन में सुख-शांति आती है और उनकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। इसी आस्था के चलते सावन के सोमवार के साथ सोम प्रदोष का संयोग शिव भक्तों के लिए विशेष माना जा रहा है।


Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। BGT एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है