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विजय दशमी : यूपी में रावण का एक ऐसा मंदिर, जहां दशहरे के दिन नहीं होता रावण दहन

 

हिंदू धर्म में दशहरा पर्व का विशेष महत्व है, जिसे विजय दशमी भी कहते हैं। पूरे देश में इस दिन को असत्य पर सत्य की जीत के रूप में उत्साहपूर्वक मनाया जाता है। मेले और उत्सवों के बीच देशभर में रावण दहन की परंपरा है, लेकिन एक स्थान ऐसा भी है, जहां रावण की पूजा की जाती है। हैरानी की बात है कि यहां रावण का एक विशाल मंदिर भी है और हर साल हजारों श्रद्धालु इस मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं। अब आप सोच रहे होंगे, आखिर ऐसा क्यों और कहां होता है? तो आइए विजयदशमी के पर्व पर जानते हैं इस अनोखे मंदिर के बारे में। 

 
कानपुर में स्थित है दशानन का मंदिर 

यह मंदिर उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले में स्थित है, जहां रावण को शक्ति के भक्त के रूप में पूजा जाता है। यहां शिव और शक्ति के मंदिरों के बीच दशानन का मंदिर बना है। इस मंदिर में रावण की प्रतिमा स्थापित है और यह मंदिर सैकड़ों साल पुराना है। खास बात यह है कि यह मंदिर साल में सिर्फ एक दिन, दशहरे के अवसर पर खुलता है।

डेढ़ सौ साल पुराना है मंदिर

यह मंदिर लगभग 150 साल पुराना है और इसका निर्माण उन्नाव के गुरु प्रसाद शुक्ल ने 1868 में कराया था। मंदिर में मां छिन्नमस्ता, मां काली, मां तारा, षोडशी, भैरवी, भुवनेश्वरी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी, दुर्गा और कई अन्य देवियों के साथ भगवान शंकर का शिवालय भी बना हुआ है। ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर की सुरक्षा के लिए महादेव के भक्त रावण को मुख्य द्वार पर बैठाया गया है।

सुहागिनें मांगती हैं अखंड सौभाग्य

इस मंदिर के कपाट दशमी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में खोले जाते हैं। पूजा और अनुष्ठान के बाद, सूर्यास्त होते ही इसे बंद कर दिया जाता है। इस दिन दूर-दूर से श्रद्धालु रावण के दर्शन के लिए आते हैं। Dussehra के दिन भगवान शिव का अभिषेक और दशानन की महाआरती की जाती है। सुहागिन महिलाएं यहां तरोई के फूल अर्पित कर अपने अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं।

दशहरे के दिन होता है रावण का अभिषेक और श्रृंगार

दशानन मंदिर में रावण की 10 सिर वाली प्रतिमा विराजमान है। Dussehra के दिन रावण का दूध, दही, घी, शहद, चंदन और गंगा जल से अभिषेक किया जाता है। साथ ही, रावण का श्रृंगार फूलों से किया जाता है और सरसों के तेल का दीपक जलाकर आरोग्यता, बल और बुद्धि की कामना की जाती है।

क्यों होती है रावण की पूजा?

कहा जाता है कि ब्रह्म बाण से नाभि में चोट लगने के बाद और रावण के धराशायी होने से पहले, कालचक्र ने उसे पूजनीय बना दिया। यही वह समय था जब भगवान राम ने लक्ष्मण से कहा था कि रावण के पैरों के पास खड़े होकर उससे नीति और ज्ञान की शिक्षा लो। राम ने कहा था कि रावण जैसा विद्वान इस धरती पर न तो कभी हुआ है और न कभी होगा। इसी ज्ञान और महानता के कारण लोग हर साल दशहरे के दिन इस मंदिर में रावण की पूजा करते हैं।