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नाबालिग बेटी की कस्टडी पिता को देने से नहीं कर सकते इनकार'', इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नाबालिग बेटी की कस्टडी से जुड़े मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट की धारा 6 का हवाला देते हुए पिता को प्राकृतिक अभिभावक माना। अदालत ने प्रतिवादियों को एक महीने के भीतर बच्ची की कस्टडी पिता को सौंपने का निर्देश दिया।
 

प्रयागराज: नाबालिग बेटी की कस्टडी को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट, 1956 की धारा 6 के तहत पिता नाबालिग बेटी का प्राकृतिक अभिभावक है। ऐसे में उसे बेटी की कस्टडी से सिर्फ इसलिए वंचित नहीं किया जा सकता कि बच्ची लंबे समय से ननिहाल में रह रही है। इसके लिए यह साबित करना जरूरी होगा कि पिता अभिभावक के तौर पर जिम्मेदारी निभाने में सक्षम नहीं है।

हाई कोर्ट ने पिता के पक्ष में सुनाया फैसला

जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस सुधांशु चौहान की डिवीजन बेंच ने प्रयागराज निवासी वकील अभिषेक यादव की अपील स्वीकार करते हुए यह आदेश दिया। यादव ने ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उनकी नाबालिग बेटी की कस्टडी उन्हें देने से इनकार कर दिया गया था।

हाई कोर्ट ने मामले की परिस्थितियों पर विचार करते हुए कहा कि धारा 6 के तहत पिता नाबालिग बच्चे का प्राकृतिक अभिभावक है। हालांकि, कस्टडी के मामलों में बच्चे का हित और उसका सुरक्षित भविष्य भी महत्वपूर्ण है।

2019 में हुई थी शादी, 2022 में बेटी का जन्म

मामले के अनुसार अभिषेक यादव की शादी वर्ष 2019 में हुई थी। वर्ष 2022 में दंपति के यहां बेटी का जन्म हुआ। वर्ष 2023 में उनकी पत्नी का भाई बच्ची को लेकर मायके चला गया। इसके अगले वर्ष 2024 में अभिषेक की पत्नी की मौत हो गई।

इसके बाद पत्नी के पिता और उसके तीन भाइयों ने बच्ची की कस्टडी अभिषेक को देने से इनकार कर दिया। इसके बाद अभिषेक ने बच्ची की कस्टडी के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया।

नाना और मौसी के पास रह रही थी बच्ची

प्रतिवादियों की ओर से अभिषेक पर पत्नी को दहेज के लिए प्रताड़ित करने और शारीरिक दुर्व्यवहार के आरोप लगाए गए। यह भी दलील दी गई कि बच्ची कुछ महीने की उम्र से ही अपने नाना के साथ रह रही है और अभिषेक के दोबारा विवाह करने की संभावना है।

ट्रायल कोर्ट ने इन परिस्थितियों को देखते हुए कस्टडी देने से इनकार कर दिया था। हालांकि, हाई कोर्ट ने पाया कि बच्ची लगातार एक ही व्यक्ति की देखरेख में नहीं थी। वह कभी अपने नाना तो कभी मौसी के साथ रह रही थी और मौसी के पहले से पांच बच्चे हैं।

बच्ची का भविष्य और स्थिरता भी देखी कोर्ट ने

हाई कोर्ट ने माना कि पिता और उसके परिवार के साथ रहने पर बच्ची को शुरुआत में तालमेल बैठाने में परेशानी हो सकती है। लेकिन अदालत ने यह भी कहा कि केवल इस वजह से उसे ऐसे माहौल में नहीं रखा जा सकता, जहां उसके भविष्य की सुरक्षा और स्थिरता पर्याप्त नजर नहीं आती।

कोर्ट ने इसी आधार पर अभिषेक यादव की अपील मंजूर कर ली और प्रतिवादियों को निर्देश दिया कि एक महीने के भीतर नाबालिग बच्ची की कस्टडी उसके पिता को सौंप दी जाए।

फैसले का सार

क्या कहा कोर्ट ने?
हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट की धारा 6 के तहत पिता नाबालिग बेटी का प्राकृतिक अभिभावक है।

क्या पिता को कस्टडी मिलना तय है?
सिर्फ प्राकृतिक अभिभावक होना अपने आप में अंतिम निर्णय नहीं है। लेकिन पिता को कस्टडी से वंचित करने के लिए उसकी अभिभावक के रूप में अयोग्यता का आधार होना जरूरी है और बच्चे का हित सर्वोपरि रहता है।