IAS corruption : यूपी IAS अभिषेक प्रकाश पर भ्रष्टाचार का शिकंजा, विजिलेंस ने शुरू की खुली जांच

Lucknow : भ्रष्टाचार के आरोप में निलंबित आईएएस अधिकारी अभिषेक प्रकाश (IAS corruption) के खिलाफ विजिलेंस विभाग ने खुली जांच शुरू कर दी है। जांच टीम उनकी संपत्ति, निवेश और आय-व्यय के ब्योरे को खंगालने में जुट गई है। अभिषेक को जल्द ही पूछताछ के लिए नोटिस जारी किया जाएगा।

IAS corruption : यूपी IAS अभिषेक प्रकाश पर भ्रष्टाचार का शिकंजा, विजिलेंस ने शुरू की खुली जांच IAS corruption : यूपी IAS अभिषेक प्रकाश पर भ्रष्टाचार का शिकंजा, विजिलेंस ने शुरू की खुली जांच

एसएईएल सोलर पी6 प्राइवेट लिमिटेड(SAEL SOLAR P6 PVT LTD) ने उत्तर प्रदेश में सौर ऊर्जा उपकरण निर्माण संयंत्र स्थापित करने के लिए 7,000 करोड़ रुपये का डीपीआर (Detailed Project Report) प्रस्तुत किया था। आरोप है कि इन्वेस्ट यूपी के अधिकारियों ने इस परियोजना को मंजूरी देने के लिए 5 प्रतिशत कमीशन की मांग की थी। मामला मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ(CM Yogi) तक पहुंचा, जिसके बाद 20 मार्च को इन्वेस्ट यूपी के सीईओ अभिषेक प्रकाश (CEO of Invest UP) को भ्रष्टाचार के आरोप में निलंबित कर दिया गया।

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लखनऊ पुलिस ने इस मामले में एफआईआर दर्ज कर निकांत जैन नामक व्यक्ति को गिरफ्तार किया था। इसके साथ ही प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने मनी लॉन्ड्रिंग के तहत अपनी जांच शुरू कर दी है।

CM YOGI
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विजिलेंस विभाग (Vigilance Department) शासन के निर्देश पर लोकसेवक की संपत्तियों, निवेश और आय-व्यय का विश्लेषण करता है। इस प्रक्रिया में आरोपी के बयान दर्ज किए जाते हैं। खुली जांच में न तो मुकदमा दर्ज होता है और न ही कोई विधिक कार्रवाई होती है। जांच पूरी होने पर विजिलेंस अपनी रिपोर्ट शासन को सौंपता है। यदि साक्ष्य पर्याप्त होते हैं, तो शासन के आदेश पर एफआईआर दर्ज कर कानूनी कार्रवाई शुरू की जाती है।

यूपी में निलंबित आईएएस अभिषेक प्रकाश के खिलाफ कार्रवाई तेज हो गई है। विजिलेंस की जांच टीम उनकी संपत्ति और वित्तीय लेनदेन की गहन पड़ताल कर रही है। सूत्रों के मुताबिक, जांच में मिले सबूतों के आधार पर आगे की कार्रवाई तय होगी।

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आईएएस अधिकारियों के लिए नियमों के अनुसार, भ्रष्टाचार के आरोप में अधिकतम दो साल तक निलंबन किया जा सकता है। इस दौरान आरोपों की जांच अनिवार्य है। वहीं, भ्रष्टाचार से इतर अन्य मामलों में निलंबन की अवधि अधिकतम एक साल हो सकती है। इस अवधि में नियुक्ति विभाग को जांच पूरी करनी होती है।

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