वाराणसी। तिरुपति बालाजी मंदिर और तिरुमला तिरुपति देवस्थानम के बारे में असदुद्दीन ओवैसी के बयान को संत समाज ने अस्वीकार किया है। अखिल भारतीय संत समिति और गंगा महासभा के राष्ट्रीय महामंत्री स्वामी जीतेंद्रानंद सरस्वती ने शनिवार को स्पष्ट रूप से कहा कि हिंदू मंदिरों में गैर-हिंदू कर्मचारियों की नियुक्ति नहीं होनी चाहिए।
असदुद्दीन ओवैसी ने हाल ही में टीटीडी बोर्ड के अध्यक्ष बीआर नायडू के एक बयान का जिक्र करते हुए सोशल मीडिया पर कहा कि तिरुमला तिरुपति देवस्थानम के अध्यक्ष का मानना है कि केवल हिंदुओं को ही वहां कार्य करने की अनुमति दी जानी चाहिए। ओवैसी ने मोदी सरकार पर यह आरोप भी लगाया कि वह वक्फ बोर्ड और वक्फ काउंसिल में गैर-मुस्लिमों की नियुक्ति अनिवार्य करना चाहती है। उनका कहना है कि हिंदू बंदोबस्ती कानूनों के अनुसार केवल हिंदुओं को ही सदस्यता दी जाती है, तो इसी तरह दूसरे समुदायों पर भी समान नियम लागू होने चाहिए।
ओवैसी के इस बयान के जवाब में संत समाज ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। स्वामी जीतेंद्रानंद ने कहा कि हिंदू मंदिरों की पवित्रता का सम्मान केवल हिंदू ही कर सकते हैं। उन्होंने चंद्रबाबू नायडू की एनडीए सरकार के इस संदर्भ में समर्थन की प्रशंसा भी की।
वक्फ बोर्ड पर टिप्पणी करते हुए स्वामी जीतेंद्रानंद ने कहा कि यह किसी मस्जिद या धार्मिक स्थल की तरह नहीं है, क्योंकि नमाज कहीं भी पढ़ी जा सकती है। उन्होंने राम जन्मभूमि विवाद का उदाहरण देते हुए बताया कि सुप्रीम कोर्ट में इस प्रश्न के सामने आने पर इस्लामिक पक्ष ने स्वीकार किया था कि नमाज जरूरी है, मस्जिद नहीं।
इसके अलावा उन्होंने कहा कि मस्जिद और वक्फ बोर्ड के नाम पर देश की भूमि का कब्जा चिंताजनक है। भारत में ही इस्लामिक वक्फ बोर्ड सक्रिय है, जबकि दुनिया के 56 इस्लामिक देशों में ऐसा कोई बोर्ड नहीं है। उनका आरोप है कि विभाजन के समय पाकिस्तान को वक्फ संपत्ति के रूप में पर्याप्त जमीन दी गई थी।