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शेयर बाजार में हाहाकार! सेंसेक्स 900 अंक से ज्यादा टूटा, निफ्टी 22,300 के नीचे; जानें क्यों आई भारी गिरावट?
 

 

नई दिल्ली। भारतीय शेयर बाजार में गुरुवार को लगातार दूसरे कारोबारी सत्र में भारी गिरावट देखने को मिली। वैश्विक बाजारों से मिले कमजोर संकेतों, बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी और विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली ने घरेलू बाजार पर दबाव बढ़ा दिया। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति में सख्ती के बाद निवेशकों की चिंता और बढ़ गई है। इसका असर प्रमुख बेंचमार्क इंडेक्स सेंसेक्स और निफ्टी 50 पर साफ दिखाई दिया।

कारोबार की शुरुआत गिरावट के साथ हुई और दिन चढ़ने के साथ बिकवाली तेज हो गई। दोपहर के कारोबार में सेंसेक्स 900 अंकों से ज्यादा लुढ़क गया, जबकि निफ्टी 50 भी 22,300 के स्तर से नीचे पहुंच गया। बाजार में आई इस गिरावट का सबसे ज्यादा असर मेटल, ऑटो, फार्मा, रियल्टी और तेल-गैस सेक्टर के शेयरों पर देखने को मिला। 

सेंसेक्स-निफ्टी में कितनी आई गिरावट?

दोपहर करीब एक बजे उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, बीएसई सेंसेक्स 909.45 अंक यानी 1.25 प्रतिशत गिरकर 71,729.26 के स्तर पर पहुंच गया। वहीं, निफ्टी 50 में 323.10 अंकों यानी 1.43 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई और यह 22,279.95 के स्तर पर कारोबार करता नजर आया।

हालांकि, बाजार के विभिन्न अपडेट में सूचकांकों के स्तर में अंतर देखा गया है। फाइनेंशियल एक्सप्रेस की दोपहर की रिपोर्ट के अनुसार, सेंसेक्स करीब 930 अंक गिरकर 71,700 के आसपास और निफ्टी 22,269 के स्तर पर पहुंच गया था। 

मेटल से लेकर रियल्टी तक, कई सेक्टरों में भारी बिकवाली

शेयर बाजार की गिरावट का असर लगभग सभी प्रमुख सेक्टरों पर दिखाई दिया। उपलब्ध सेक्टोरल आंकड़ों के अनुसार, निफ्टी मेटल इंडेक्स में 3.23 प्रतिशत की सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई। इसके अलावा तेल एवं गैस सेक्टर में 2.60 प्रतिशत, रियल्टी में 2.39 प्रतिशत, हेल्थकेयर में 2.21 प्रतिशत और फार्मा में 2.13 प्रतिशत की कमजोरी देखने को मिली।

निफ्टी एफएमसीजी में 1.81 प्रतिशत, ऑटो में 1.78 प्रतिशत और मीडिया सेक्टर में 1.71 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।

हालांकि, बाजार में व्यापक कमजोरी के बीच आईटी सेक्टर के कुछ शेयरों में मजबूती बनी रही। टीसीएस, इन्फोसिस और एचसीएल टेक जैसे शेयरों ने गिरते बाजार में अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया। 

RBI के फैसले से क्यों बढ़ी निवेशकों की चिंता?

शेयर बाजार में गिरावट की एक बड़ी वजह भारतीय रिजर्व बैंक का हालिया मौद्रिक नीति निर्णय माना जा रहा है। आरबीआई ने रेपो रेट में 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी कर इसे 5.50 प्रतिशत कर दिया है। इसके साथ ही केंद्रीय बैंक ने अपनी मौद्रिक नीति का रुख 'न्यूट्रल' से बदलकर 'कैलिब्रेटेड टाइटनिंग' कर दिया है।

इस फैसले को महंगाई नियंत्रित करने की दिशा में उठाया गया कदम माना जा रहा है। हालांकि, ब्याज दरों में बढ़ोतरी से कंपनियों के लिए कर्ज लेना महंगा हो सकता है, जिससे उनके मुनाफे और विस्तार योजनाओं पर असर पड़ने की आशंका है।

विश्लेषकों का मानना है कि ऊंची ब्याज दरों के कारण निवेशकों का झुकाव शेयर बाजार से हटकर बॉन्ड और अन्य फिक्स्ड इनकम विकल्पों की ओर भी बढ़ सकता है। 

विदेशी निवेशकों की बिकवाली ने बढ़ाया दबाव

भारतीय शेयर बाजार में विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की लगातार बिकवाली भी चिंता का विषय बनी हुई है। सात अक्टूबर को विदेशी निवेशकों ने लगभग 6,121 करोड़ रुपये के भारतीय शेयरों की शुद्ध बिकवाली की थी।

वहीं, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेज उछाल से वैश्विक शेयर बाजारों पर दबाव बढ़ा है। अमेरिकी 10-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड 5.3 प्रतिशत के आसपास पहुंचने से उभरते बाजारों में विदेशी पूंजी के प्रवाह को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।

विशेषज्ञों के मुताबिक, विदेशी निवेशकों की बिकवाली जारी रहने की स्थिति में भारतीय शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है। 

कच्चे तेल की कीमतों ने भी बढ़ाई मुश्किल

मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है। ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर कारोबार कर रहा है।

भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बढ़ोतरी से आयात बिल और महंगाई का दबाव बढ़ सकता है। यही वजह है कि कच्चे तेल में तेजी भी शेयर बाजार के लिए नकारात्मक संकेत बनकर सामने आई है। 

आगे कैसी रह सकती है बाजार की चाल?

बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, आने वाले कारोबारी सत्रों में निवेशकों की नजर आरबीआई की नीतियों, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, विदेशी निवेशकों के रुख और अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों पर रहेगी।

इसके अलावा कंपनियों के तिमाही नतीजे भी बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक वैश्विक अनिश्चितता और विदेशी निवेशकों की बिकवाली का दबाव कम नहीं होता, तब तक भारतीय शेयर बाजार में अस्थिरता बनी रह सकती है।