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FD, बॉन्ड या डेट फंड? सुरक्षित निवेश चाहने वालों के लिए कौन सा ऑप्शन कितना सही, समझें पूरा गणित

FD, बॉन्ड और डेट फंड में निवेश करने से पहले इनके रिटर्न, जोखिम, टैक्स और लिक्विडिटी को समझना जरूरी है। कंजर्वेटिव निवेशकों के लिए हर विकल्प की भूमिका अलग है। जानिए 1, 3 और 5 साल की निवेश अवधि में कौन-कौन से पहलू ध्यान में रखने चाहिए और 10 लाख रुपये के निवेश को कैसे बांटा जा सकता है।

 

FD vs Bonds vs Debt Funds: अगर आप निवेश में ज्यादा जोखिम नहीं लेना चाहते, तो सिर्फ ज्यादा रिटर्न देखकर पैसा लगाने के बजाय सुरक्षा, जरूरत के समय पैसे की उपलब्धता और टैक्स के बाद मिलने वाले रिटर्न को भी देखना जरूरी है। ऐसे निवेशकों के सामने अक्सर तीन विकल्प होते हैं- बैंक FD, बॉन्ड और डेट म्यूचुअल फंड। तीनों फिक्स्ड इनकम से जुड़े विकल्प हैं, लेकिन इनका जोखिम और काम करने का तरीका अलग है।

विशेषज्ञों के मुताबिक कंजर्वेटिव निवेशक के लिए फिक्स्ड इनकम निवेश के तीन प्रमुख उद्देश्य होने चाहिए- पूंजी की सुरक्षा, अनुमानित कैश फ्लो और जरूरत पड़ने पर पैसे की उपलब्धता। मौजूदा ब्याज दरों के माहौल में सिर्फ 1-2 फीसदी अतिरिक्त रिटर्न के लिए ज्यादा क्रेडिट रिस्क लेना जरूरी नहीं है।

FD क्यों अब भी पसंद किया जाता है?

बैंक FD यानी फिक्स्ड डिपॉजिट उन निवेशकों के बीच लोकप्रिय है जो पहले से तय ब्याज दर और मैच्योरिटी चाहते हैं। अगर FD को मैच्योरिटी तक रखा जाता है, तो बाजार में रोज होने वाले उतार-चढ़ाव का सीधा असर निवेशक की रकम पर नहीं पड़ता।

इमरजेंसी फंड या अगले कुछ वर्षों में इस्तेमाल होने वाले पैसे के लिए FD उपयोगी हो सकता है। हालांकि, समय से पहले FD तोड़ने पर बैंक की शर्तों के मुताबिक पेनल्टी या कम ब्याज मिल सकता है।

एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि DICGC के तहत पात्र बैंक जमा पर प्रति जमाकर्ता, प्रति बैंक अधिकतम 5 लाख रुपये तक डिपॉजिट इंश्योरेंस मिलता है, जिसमें मूलधन और ब्याज दोनों शामिल हैं। इसलिए बड़ी रकम को एक ही बैंक में रखने के बजाय अलग-अलग बैंकों में बांटने पर भी विचार किया जा सकता है।

बॉन्ड में ज्यादा ब्याज का मतलब ज्यादा सुरक्षा नहीं

बॉन्ड के जरिए निवेशक किसी सरकार या कंपनी को पैसा उधार देता है और उसके बदले ब्याज प्राप्त करता है। लेकिन यहां सबसे महत्वपूर्ण चीज बॉन्ड जारी करने वाले की क्रेडिट क्वालिटी है।

सरकारी सिक्योरिटीज में संप्रभु समर्थन होता है, जबकि कॉरपोरेट बॉन्ड में कंपनी के डिफॉल्ट का जोखिम जुड़ा रहता है। इसलिए केवल यह देखकर बॉन्ड नहीं चुनना चाहिए कि उसमें FD से ज्यादा ब्याज मिल रहा है।

मसलन, 8.5 फीसदी ब्याज देने वाला बॉन्ड जरूरी नहीं कि 6.5 फीसदी FD से बेहतर हो। अतिरिक्त ब्याज के पीछे क्रेडिट रिस्क, लिक्विडिटी रिस्क, अवधि यानी ड्यूरेशन रिस्क या अन्य जोखिम हो सकते हैं।

कंजर्वेटिव निवेशकों के लिए उच्च गुणवत्ता वाली सरकारी सिक्योरिटीज, चुनिंदा PSU बॉन्ड और अच्छी तरह सुरक्षित कॉरपोरेट बॉन्ड जैसे विकल्पों को उनकी शर्तों और जोखिम को समझकर देखा जा सकता है।

डेट फंड में पैसा लगाने पर क्या बदल जाता है?

डेट म्यूचुअल फंड सीधे एक बॉन्ड में पैसा लगाने के बजाय कई डेट इंस्ट्रूमेंट्स में निवेश करते हैं। इससे पोर्टफोलियो में डायवर्सिफिकेशन मिलता है और जरूरत के हिसाब से पैसा निकालना आमतौर पर FD या कुछ कॉरपोरेट बॉन्ड की तुलना में आसान हो सकता है।

लेकिन डेट फंड को FD की तरह नहीं समझना चाहिए। इसमें रिटर्न फिक्स नहीं होता और फंड की NAV ऊपर-नीचे हो सकती है।

इसका एक बड़ा कारण ब्याज दरों में बदलाव है। सामान्य तौर पर बाजार में बॉन्ड यील्ड बढ़ने पर पहले से जारी बॉन्ड की कीमत घट सकती है। इसका असर खासकर लंबी अवधि वाले डेट फंड की NAV पर पड़ सकता है। इसलिए ब्याज दरों के बढ़ने की स्थिति में लॉन्ग-ड्यूरेशन डेट फंड में अस्थायी गिरावट देखने को मिल सकती है।

सिर्फ ब्याज दर देखकर निवेश करना पड़ सकता है महंगा

निवेश की तुलना करते समय सिर्फ 7 फीसदी या 8 फीसदी की ब्याज दर देखना पर्याप्त नहीं है। टैक्स के बाद आपके हाथ में वास्तव में कितनी रकम आएगी, यह भी देखना जरूरी है।

FD का ब्याज निवेशक की लागू आयकर स्लैब के अनुसार टैक्स के दायरे में आता है। वहीं डेट फंड की टैक्स व्यवस्था निवेश की प्रकृति और लागू नियमों पर निर्भर करती है। मौजूदा नियमों में 1 अप्रैल 2023 या उसके बाद खरीदे गए ऐसे निर्दिष्ट म्यूचुअल फंड, जिनमें 65 फीसदी से अधिक निवेश डेट और मनी मार्केट इंस्ट्रूमेंट्स में है, सेक्शन 50AA के दायरे में आते हैं और इनके लाभ को शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन के तौर पर टैक्स किया जाता है।

इसलिए निवेशक के लिए सही तुलना 'कहां ब्याज ज्यादा है' के बजाय 'टैक्स और सभी लागतों के बाद कितना पैसा बचेगा' के आधार पर होनी चाहिए।

निवेश से पहले इन चार जोखिमों को समझें

क्रेडिट रिस्क: बॉन्ड जारी करने वाला संस्थान ब्याज या मूलधन चुकाने में असमर्थ हो जाए।

इंटरेस्ट रेट रिस्क: ब्याज दरों में बदलाव से बॉन्ड की बाजार कीमत प्रभावित हो सकती है। यह जोखिम लंबी अवधि वाले बॉन्ड और डेट फंड में ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। लिक्विडिटी रिस्क: निवेश को जरूरत के समय आसानी से बेच पाना मुश्किल हो सकता है। खासकर कुछ कॉरपोरेट बॉन्ड में ट्रेडिंग कम होने के कारण यह समस्या आ सकती है।

रीइन्वेस्टमेंट रिस्क: अगर आपने तीन साल की FD कराई और मैच्योरिटी के समय ब्याज दरें कम हो गईं, तो आपको अपनी रकम कम दर पर दोबारा निवेश करनी पड़ सकती है।

10 लाख रुपये को कैसे बांटा जा सकता है?

India Today से बातचीत में विशेषज्ञ ने एक उदाहरण के तौर पर 10 लाख रुपये के लिए 30:35:35 का ढांचा बताया। इसमें करीब 3 लाख रुपये बैंक डिपॉजिट या FD में, 3.5 लाख रुपये उच्च गुणवत्ता वाले सुरक्षित बॉन्ड में और बाकी 3.5 लाख रुपये उच्च गुणवत्ता वाले डेट म्यूचुअल फंड में रखने का उदाहरण दिया गया।

हालांकि, इसे कोई तय फॉर्मूला नहीं माना जाना चाहिए। वास्तविक निवेश का बंटवारा व्यक्ति की आय, लक्ष्य, जोखिम क्षमता, टैक्स स्थिति और पैसे की जरूरत कब पड़ेगी, इस पर निर्भर करेगा।

इस तरह का पोर्टफोलियो मोटे तौर पर तीन हिस्सों में काम कर सकता है—एक हिस्सा इमरजेंसी और तुरंत जरूरत के लिए, दूसरा अपेक्षाकृत सुरक्षित बॉन्ड के जरिए यील्ड लॉक करने के लिए और तीसरा डेट फंड के जरिए डायवर्सिफिकेशन और लिक्विडिटी के लिए।

1 साल, 3 साल और 5 साल के लिए रणनीति अलग हो सकती है

अगर पैसा एक साल के भीतर चाहिए, तो बैंक FD, ट्रेजरी बिल और हाई-क्वालिटी मनी मार्केट या बहुत कम अवधि वाले डेट फंड जैसे विकल्पों पर विचार किया जा सकता है। इतनी कम अवधि के पैसे में ज्यादा रिटर्न के लिए लंबी अवधि या ज्यादा क्रेडिट रिस्क लेना जरूरी नहीं है।

तीन साल की अवधि में निवेशक के पास थोड़ा अधिक विकल्प होता है। FD के साथ लगभग तीन साल की अवधि वाले उच्च गुणवत्ता वाले बॉन्ड और उपयुक्त Banking & PSU या Corporate Bond Funds पर विचार किया जा सकता है।

वहीं पांच साल की अवधि में हाई-क्वालिटी बॉन्ड और उपयुक्त डेट फंड पोर्टफोलियो में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। हालांकि, केवल इस उम्मीद में बहुत ज्यादा ड्यूरेशन रिस्क लेना उचित नहीं माना जाता कि भविष्य में ब्याज दरें निश्चित रूप से गिरेंगी।

FD, बॉन्ड या डेट फंड—फैसला किस आधार पर?

तीनों विकल्पों की अपनी अलग भूमिका है। FD में रिटर्न और मैच्योरिटी की अधिक स्पष्टता होती है, बॉन्ड में तय यील्ड लॉक करने का मौका मिल सकता है, जबकि डेट फंड डायवर्सिफिकेशन और अपेक्षाकृत बेहतर लिक्विडिटी दे सकते हैं।

इसलिए निवेश का फैसला केवल सबसे ज्यादा ब्याज दर देखकर नहीं होना चाहिए। निवेश की अवधि, पैसे की जरूरत, क्रेडिट क्वालिटी, ब्याज दर का जोखिम, लिक्विडिटी और टैक्स के बाद मिलने वाला रिटर्न—इन सभी को साथ में देखना जरूरी है।

कंजर्वेटिव निवेशक के लिए लक्ष्य केवल अधिक रिटर्न हासिल करना नहीं, बल्कि ऐसा फिक्स्ड-इनकम पोर्टफोलियो तैयार करना होना चाहिए जिसमें जोखिम उसकी क्षमता के भीतर रहे और जरूरत पड़ने पर पैसा उपलब्ध हो।