IDBI Bank Sale: 52,878 करोड़ में बिकेगा IDBI बैंक? फेयरफैक्स डील पर क्यों उठ रहे सवाल, राहुल गांधी ने भी घेरा
IDBI बैंक की 60.72% हिस्सेदारी ₹52,878 करोड़ में फेयरफैक्स को बेचने के फैसले पर विवाद बढ़ गया है। बैंक के मूल्यांकन, ₹81 प्रति शेयर की बोली और प्रक्रिया पर उठे सवालों के बीच राहुल गांधी ने निजीकरण का विरोध किया है। जानिए सरकार ने क्या सफाई दी।
IDBI बैंक की बहुमत हिस्सेदारी कनाडा की वित्तीय सेवा कंपनी फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स को बेचने के फैसले पर विवाद गहरा गया है। ₹52,878 करोड़ के इस सौदे को लेकर बैंक के मूल्यांकन और बोली प्रक्रिया पर सवाल उठाए जा रहे हैं। कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने बैंक के निजीकरण का विरोध करते हुए कर्मचारियों के हितों पर चिंता जताई है। वहीं, वित्त मंत्रालय ने सौदे की प्रक्रिया को सही ठहराते हुए कहा है कि सभी जरूरी नियमों का पालन किया गया है।
14 अक्टूबर 2026 को आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (CCEA) ने IDBI बैंक की 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स को बेचने की मंजूरी दी थी। इस सौदे में केंद्र सरकार की 30.48 प्रतिशत और भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) की 30.24 प्रतिशत हिस्सेदारी शामिल है। सौदे के बाद केंद्र सरकार के पास 15 प्रतिशत और LIC के पास 19 प्रतिशत हिस्सेदारी बनी रहेगी।
किस कीमत पर हो रहा है IDBI बैंक का सौदा?
इस सौदे के तहत फेयरफैक्स की ओर से प्रति शेयर ₹81 की पेशकश की गई है। वित्त मंत्रालय के अनुसार, यह कीमत संशोधित स्वतंत्र मूल्यांकन के ₹75.99 प्रति शेयर के बेंचमार्क से अधिक है। हालांकि, विवाद की मुख्य वजह यह है कि शुरुआती दौर में सरकार ने बैंक के लिए ₹94.42 प्रति शेयर का रिजर्व प्राइस तय किया था।
12 मार्च 2026 को खोली गई शुरुआती बोलियों में दोनों बोलीदाताओं की पेशकश इस रिजर्व प्राइस से कम थी। दोनों ने निर्धारित कीमत से मेल खाने से इनकार कर दिया था। इसके बाद प्रक्रिया में बदलाव और नए मूल्यांकन को लेकर सवाल उठने लगे।
₹94.42 से ₹75.99 तक कैसे पहुंचा मूल्यांकन?
एक मीडिया रिपोर्ट में सरकार की आंतरिक बैठकों के कथित मिनट्स का हवाला देते हुए बोली प्रक्रिया और मूल्यांकन के तरीके पर सवाल उठाए गए। रिपोर्ट के अनुसार, फेयरफैक्स ने 1 जून को संशोधित पेशकश दी थी, जिसे 13 जुलाई को खोला गया। इसमें कंपनी की ओर से ₹81 प्रति शेयर की कीमत सामने आई।
इसके बाद नए सिरे से मूल्यांकन कराने की प्रक्रिया अपनाई गई। इस मूल्यांकन में बैंक की कीमत ₹75.99 प्रति शेयर तय हुई, जिसके मुकाबले फेयरफैक्स की ₹81 प्रति शेयर की पेशकश को स्वीकार किया गया। इस तरह शुरुआती ₹94.42 के रिजर्व प्राइस की तुलना में अंतिम पेशकश करीब 19.5 प्रतिशत कम रही।
मूल्यांकन के लिए किन बैंकों को तुलनात्मक आधार बनाया गया, इस पर भी सवाल उठे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, इसमें सूचीबद्ध सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को शामिल किया गया, जबकि निजी बैंकों को तुलनात्मक सूची से बाहर रखा गया। चूंकि RBI वर्ष 2019 से IDBI बैंक को नियामकीय उद्देश्यों के लिए निजी बैंक मानता है, इसलिए इस चयन पर सवाल उठाए गए। बैंक के शेयर मूल्य और उसकी अमूर्त संपत्तियों के मूल्यांकन के तरीके को लेकर भी चर्चा हुई है।
वित्त मंत्रालय ने क्या दी सफाई?
वित्त मंत्रालय ने 29 अक्टूबर को जारी स्पष्टीकरण में बोली और मूल्यांकन प्रक्रिया का बचाव किया। मंत्रालय के मुताबिक, कैबिनेट समिति ने विनिवेश से जुड़े मामलों में आने वाली प्रक्रियागत दिक्कतों को दूर करने के लिए कोर ग्रुप ऑफ सेक्रेटरीज ऑन डिसइन्वेस्टमेंट (CGD) को विशेष अधिकार दिए थे। इसी अधिकार के तहत दूसरे या बेस्ट ऑफर राउंड की प्रक्रिया तय की गई।
मंत्रालय ने कहा कि रिजर्व प्राइस को न तो घटाया गया और न ही बढ़ाया गया। शुरुआती दौर में बोलियां मंजूर नहीं होने के बाद वह प्रक्रिया समाप्त हो गई थी। इसके बाद योग्य बोलीदाताओं से वित्त वर्ष 2026-27 में उनकी सबसे बेहतर पेशकश मांगी गई।
सरकार के अनुसार, मूल्यांकन दो स्वतंत्र सलाहकारों ने अलग-अलग तरीकों से किया। प्रक्रिया को डबल-ब्लाइंड रखा गया था। इसका मतलब है कि बोली लगाने वाली कंपनी को मूल्यांकन की जानकारी नहीं थी और मूल्यांकन करने वाली एजेंसियों को बोलियों की जानकारी नहीं थी। CGD ने दोनों जानकारियों की तुलना कर अंतिम निर्णय लिया।
टैक्स देनदारी को लेकर भी उठे सवाल
सौदे में कुछ विवादित टैक्स मांगों से जुड़ी क्षतिपूर्ति यानी इंडेम्निटी का प्रावधान भी शामिल है। वित्त मंत्रालय ने इसका बचाव करते हुए कहा कि योग्य बोलीदाताओं की ओर से इस तरह की मांग की गई थी, ताकि वे बेहतर कीमत की पेशकश कर सकें।
मंत्रालय के मुताबिक, इस प्रावधान के तहत संभावित देनदारी ₹627 करोड़ तक हो सकती है, जबकि इससे सौदे की बोली में ₹3,917 करोड़ की बढ़ोतरी हुई। सरकार का कहना है कि यदि अतिरिक्त टैक्स मांग का भुगतान करना पड़ता है, तभी उसके लिए क्षतिपूर्ति दी जाएगी।
राहुल गांधी ने निजीकरण और कर्मचारियों के हितों पर उठाए सवाल
IDBI बैंक की बिक्री को लेकर राहुल गांधी ने 29 अक्टूबर को बैंक कर्मचारियों के नाम खुला पत्र लिखा। उन्होंने सवाल किया कि जिस बैंक ने वित्तीय स्थिति में सुधार कर मुनाफे में वापसी की है, उसका निजीकरण करने की जरूरत क्यों पड़ रही है।
राहुल गांधी ने संसद में 2003 में दिए गए उस आश्वासन का भी उल्लेख किया, जिसमें सरकार ने IDBI बैंक में कम से कम 51 प्रतिशत हिस्सेदारी बनाए रखने की बात कही थी। उन्होंने माना कि यह आश्वासन कानूनी रूप से बाध्यकारी न हो, लेकिन इसे देश की जनता से की गई प्रतिबद्धता बताया।
उन्होंने निजीकरण के बाद अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण व्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर भी चिंता जताई। इसके अलावा कर्मचारियों की सेवा शर्तों, पेंशन और दूसरे लाभों पर संभावित असर का मुद्दा उठाया।
निर्मला सीतारमण ने आरोपों को बताया झूठ
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने राहुल गांधी के आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्हें झूठ बताया और कहा कि IDBI बैंक की हिस्सेदारी बेचने की प्रक्रिया में सभी जरूरी नियमों का पालन किया गया है। वित्त मंत्रालय की सफाई मुख्य रूप से बोली प्रक्रिया और मूल्यांकन से जुड़े सवालों पर केंद्रित रही। कर्मचारियों के हितों और आरक्षण से संबंधित राहुल गांधी की सभी चिंताओं पर इस स्पष्टीकरण में जवाब नहीं दिया गया।
IDBI बैंक की बिक्री को लेकर फिलहाल दो बड़े सवाल चर्चा में हैं। पहला, वित्तीय स्थिति में सुधार के बाद बैंक का निजीकरण क्यों किया जा रहा है और दूसरा, इसकी बिक्री कीमत तय करने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी रही। हालांकि, अब तक किसी अदालत या जांच एजेंसी की ओर से इस सौदे में धोखाधड़ी या आपराधिक गड़बड़ी स्थापित नहीं की गई है।