मिडिल ईस्ट युद्ध से तेल बाजार में उथल-पुथल, Crude Oil कीमतें 120 डॉलर पार
New Delhi : ईरान और इजरायल-अमेरिका के बीच जारी युद्ध ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को हिला दिया है। क्रूड ऑयल की कीमतें सोमवार को 120 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गईं, जिससे दुनिया भर में एनर्जी सप्लाई में रुकावट आने का डर फिर से बढ़ गया है। इस उछाल ने 2008 की यादें ताजा कर दी हैं, जब क्रूड ऑयल की कीमतें 147 डॉलर प्रति बैरल के रिकॉर्ड हाई पर पहुंच गई थीं। लेकिन उस समय भी यह उछाल किसी जंग या लड़ाई की वजह से नहीं था।
US एनर्जी इन्फॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन (EIA) के आंकड़ों के मुताबिक
तेल की कीमतें 2003 में लगभग 30 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 2008 की शुरुआत में 100 डॉलर से ज्यादा हो गई थीं। इस रिकॉर्ड तेजी की सबसे बड़ी वजह भारत और चीन जैसे उभरते बाजारों में तेजी से हो रहा औद्योगिकरण था। इससे तेल की खपत काफी ज्यादा बढ़ गई, जिसका कीमतों पर सीधा असर पड़ा।
कीमतें बढ़ने के अन्य प्रमुख कारण
- वैश्विक स्तर पर तेल की अधिक मांग के विपरीत उत्पादन धीमा रहने से बाजार में कमी पैदा हुई।
- डॉलर की वैल्यू में गिरावट से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खरीदारों के लिए तेल सस्ता हो गया, जिससे मांग और कीमतें दोनों बढ़ गईं।
- डॉलर कमजोर होने से दूसरी करेंसीज के लिए इसे खरीदना महंगा हो गया, जिससे सट्टेबाजी बढ़ी।
- फाइनेंशियल मार्केट ने भी रैली को बढ़ाने में भूमिका निभाई। फेडरल रिजर्व बैंक ऑफ सेंट लुइस की एक स्टडी में पाया गया कि 2000 के दशक में ऑयल फ्यूचर्स मार्केट में निवेशकों की बढ़ी हुई हिस्सेदारी ने कीमतों में ज्यादा उतार-चढ़ाव में योगदान दिया।
- कमोडिटी मार्केट में हेज फंड और इंस्टीट्यूशनल निवेशकों से बड़े पैमाने पर कैपिटल फ्लो ने रैली को और तेज कर दिया।
वर्तमान स्थिति और भारत पर असर
ईरान-इजरायल युद्ध से वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता बढ़ गई है। ब्रेंट क्रूड की कीमतें 120 डॉलर के पार पहुंचने से भारत जैसे तेल आयातक देशों पर दबाव बढ़ गया है। भारत अपनी कुल तेल जरूरतों का लगभग 90 प्रतिशत आयात करता है। ऐसे में ऊर्जा कीमतों में उछाल से महंगाई और चालू खाते के घाटे पर असर पड़ सकता है।