ओल्ड मंक को रम कहने पर क्यों है विवाद? कंपनी ने बताया 500 करोड़ का नुकसान, कंपनी ने कोर्ट में क्या कहा
महाराष्ट्र में ओल्ड मंक की बिक्री पर रोक को लेकर FSSAI और निर्माता कंपनी के बीच विवाद बॉम्बे हाईकोर्ट पहुंच गया है। कंपनी ने ₹500 करोड़ से अधिक के नुकसान का दावा किया है। नियामक ‘Rum’ के बजाय ‘Rum-like’ लेबल चाहता है। मामले की अगली सुनवाई 23 अक्टूबर को होगी।
Old Monk News: लोकप्रिय शराब ब्रांड ओल्ड मंक (Old Monk) की महाराष्ट्र में बिक्री को लेकर विवाद बॉम्बे हाईकोर्ट पहुंच गया है। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) का कहना है कि कंपनी अपने उत्पाद के लेबल पर ‘Rum’ के बजाय ‘Rum-like’ लिखने पर सहमत होती है, तभी बिक्री की अनुमति देने पर विचार किया जा सकता है। वहीं, निर्माता कंपनी ने अदालत में दावा किया है कि बिक्री पर लगी रोक से उसे ₹500 करोड़ से अधिक का नुकसान हुआ है।
यह मामला अब केवल बिक्री पर लगी रोक तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में यह सवाल है कि न्यूट्रल स्पिरिट में रम का फ्लेवर मिलाकर तैयार किए गए उत्पाद को नियमों के तहत ‘रम’ के नाम से बेचा जा सकता है या नहीं। बॉम्बे हाईकोर्ट ने मामले की अंतिम सुनवाई के लिए 23 अक्टूबर की तारीख तय की है।
‘Rum’ नहीं, ‘Rum-like’ लिखने पर क्यों अड़ा है FSSAI?
FSSAI ने ओल्ड मंक के कुछ वेरिएंट की बिक्री पर रोक लगाने की कार्रवाई की थी। नियामक की आपत्ति उत्पाद में बाहरी रम फ्लेवर मिलाने और उसे सामान्य रम के रूप में पेश करने को लेकर है।
FSSAI का तर्क है कि न्यूट्रल स्पिरिट में कृत्रिम या प्रकृति के समान फ्लेवर मिलाने से उत्पाद की मूल विशेषताएं छिप सकती हैं। ऐसे उत्पाद को सामान्य रम के नाम से बेचना उपभोक्ताओं के लिए भ्रामक हो सकता है। नियामक चाहता है कि उत्पाद की वास्तविक प्रकृति के अनुसार उसका लेबल तय किया जाए।
12 अक्टूबर को बॉम्बे हाईकोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अनिल सिंह ने कहा कि निर्माता कंपनी लेबल पर ‘Rum’ की जगह ‘Rum-like’ लिखने पर सहमत होती है, तो बिक्री की अनुमति देने का रास्ता निकल सकता है।
कंपनी ने कोर्ट में क्या दलील दी?
ओल्ड मंक की निर्माता कंपनी मोहन रॉकी स्प्रिंगवॉटर प्राइवेट लिमिटेड की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता वेंकटेश धोंड ने अदालत को बताया कि ठाणे जिले की इकाई से बिक्री पर रोक लगने के कारण कंपनी को ₹500 करोड़ से अधिक का नुकसान हुआ है।
कंपनी ने यह भी दावा किया कि महाराष्ट्र के आबकारी विभाग को करीब ₹350 करोड़ के राजस्व का नुकसान हुआ है। इसके अलावा, लगभग 300 कर्मचारी प्रभावित हुए हैं।
निर्माता कंपनी ने अदालत में यह दलील भी दी कि उसका उत्पाद दूसरे राज्यों में बिक रहा है, जबकि महाराष्ट्र में बिक्री पर रोक बनी हुई है। कंपनी ने FSSAI के प्रतिबंधात्मक आदेश को चुनौती दी है।
ध्यान देने वाली बात यह है कि ये नुकसान के आंकड़े कंपनी की ओर से अदालत में रखे गए दावे हैं। इन्हें अदालत द्वारा सत्यापित या अंतिम रूप से तय किया गया नुकसान नहीं माना जाना चाहिए।
लेबल में बदलाव की कोशिश भी नहीं हुई सफल
विवाद सुलझाने के लिए निर्माता कंपनी ने पहले संशोधित लेबल पेश करने पर सहमति जताई थी। कंपनी ने प्रस्तावित लेबल से ‘7 Years Old Blended’ जैसे उम्र से जुड़े विवरण हटाने और ‘Added Flavour’ यानी अतिरिक्त फ्लेवर की जानकारी प्रमुखता से देने का विकल्प रखा था।
लेकिन FSSAI ने संशोधित लेबल को मंजूरी नहीं दी। दोनों पक्षों के बीच बातचीत से भी सहमति नहीं बन सकी।
इसके बाद कंपनी ने अदालत से मामले का अंतिम फैसला सुनाने के लिए सुनवाई करने का अनुरोध किया। बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस पर सहमति जताते हुए मामले को 23 अक्टूबर को अंतिम सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है। इससे पहले अदालत ने बिक्री पर लगी रोक के खिलाफ तत्काल अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया था।
सिर्फ ओल्ड मंक ही नहीं, दूसरे ब्रांड भी जांच के दायरे में
FSSAI की कार्रवाई केवल ओल्ड मंक तक सीमित नहीं रही है। अगस्त 2026 में नियामक ने कुछ अन्य शराब उत्पादों के वेरिएंट पर भी फ्लेवरिंग और लेबलिंग संबंधी नियमों के उल्लंघन को लेकर कार्रवाई की थी।
इनमें कुछ वेरिएंट के McDowell’s No. 1 Rum, Antiquity Blue Whisky, Royal Challenge Whisky, Bagpiper Deluxe Whisky और Old Cask Deluxe XXX Rum शामिल थे।
नियामक का कहना है कि रम में रम फ्लेवर या व्हिस्की में व्हिस्की फ्लेवर मिलाकर उत्पाद की सामान्य पहचान के तहत बिक्री करना निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं हो सकता। हालांकि, अलग-अलग कंपनियों और उत्पादों के मामले में कार्रवाई की स्थिति अलग हो सकती है।
23 अक्टूबर को हाईकोर्ट में अगली सुनवाई
ओल्ड मंक विवाद में अब अगला महत्वपूर्ण पड़ाव 23 अक्टूबर है। अदालत में यह तय होना है कि निर्माता कंपनी की दलीलों और FSSAI की आपत्तियों के बीच कानूनी स्थिति क्या बनती है।
फिलहाल महाराष्ट्र में संबंधित उत्पादों की बिक्री पर रोक को लेकर विवाद जारी है। कंपनी को राहत मिलती है या लेबल में बदलाव की शर्त स्वीकार करनी पड़ती है, इसका जवाब अगली सुनवाई और अदालत के फैसले से ही स्पष्ट होगा।