चीनी के दाम में रिकॉर्ड उछाल, 70 रुपये किलो के पार पहुंची कीमत; इथेनॉल और कम स्टॉक ने बढ़ाई चिंता
नई दिल्ली। देश में इन दिनों चाय से ज्यादा चर्चा चीनी की हो रही है। अगस्त-सितंबर में त्योहारों का सीजन शुरू होने से पहले ही चीनी और गुड़ के दाम तेजी से बढ़ रहे हैं। चीनी की कीमत कई शहरों में 70 रुपये प्रति किलो के पार पहुंच चुकी है। बीते तीन महीनों में चीनी के दाम में करीब 40 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। महंगाई की इस तेजी ने सरकार की चिंता बढ़ा दी है, वहीं विपक्ष भी इसे लेकर सरकार पर सवाल उठा रहा है।
थोक बाजार में चीनी की कीमत 58-60 रुपये प्रति किलो के आसपास पहुंच गई है। वहीं कई शहरों में खुदरा बाजार में उपभोक्ताओं को 65 से 72 रुपये प्रति किलो तक कीमत चुकानी पड़ रही है। ऑनलाइन ग्रॉसरी प्लेटफॉर्म पर यही चीनी 72 से 75 रुपये प्रति किलो तक बिक रही है।
तीन महीने में 40 फीसदी से ज्यादा महंगी हुई चीनी
केंद्र सरकार के उपभोक्ता मामलों के विभाग के आंकड़ों के मुताबिक 20 अगस्त को देश में चीनी की औसत खुदरा कीमत करीब 55 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई। वहीं अलग-अलग शहरों में कीमत इससे काफी ज्यादा है। दिल्ली और नोएडा में चीनी 70-72 रुपये प्रति किलो तक बिक रही है।
चीनी की एक्स-फैक्ट्री कीमत 5,400 रुपये प्रति क्विंटल के पार पहुंच गई है, जबकि थोक कीमत करीब 5,800 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच चुकी है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में चीनी की औसत कीमत करीब 52.3 रुपये प्रति किलो है, जो पिछले साल की समान अवधि की तुलना में लगभग 13 फीसदी ज्यादा है। जुलाई में भी चीनी के खुदरा दाम में करीब 9 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई थी।
इन शहरों में चीनी के क्या हैं दाम?
Agmarknet पर उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक कई बड़े शहरों में चीनी की कीमत इस प्रकार है—
दिल्ली: 68-70 रुपये प्रति किलो
कानपुर: 65 रुपये प्रति किलो
रांची: 65 रुपये प्रति किलो
कोलकाता: 65 रुपये प्रति किलो
रायपुर: 64 रुपये प्रति किलो
मुंबई: 64 रुपये प्रति किलो
भोपाल: 70 रुपये प्रति किलो
असम: 51 रुपये प्रति किलो
महाराष्ट्र: 45 रुपये प्रति किलो
पटना: 70 रुपये प्रति किलो
आखिर अचानक क्यों बढ़ रहे हैं चीनी के दाम?
चीनी की कीमतों में तेजी के पीछे सबसे बड़ी वजह बाजार में उपलब्धता को लेकर बढ़ती चिंता मानी जा रही है। उत्पादन में कमी, निर्यात और इथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ने के इस्तेमाल के कारण सीजन के अंत तक चीनी का स्टॉक कम रहने की आशंका है।
अनुमान है कि 30 सितंबर 2026 तक भारत का क्लोजिंग शुगर स्टॉक करीब 35-40 लाख टन रह सकता है, जबकि 2025 में यह लगभग 50 लाख टन था। ऐसे में नई फसल बाजार में आने तक चीनी की कीमतों पर दबाव बने रहने की आशंका है।
निर्यात ने भी घरेलू उपलब्धता को प्रभावित किया है। नवंबर 2025 में सरकार ने 15 लाख टन चीनी के निर्यात की अनुमति दी थी, जिसे बाद में बढ़ाकर 20 लाख टन कर दिया गया। निर्यात पर रोक लगाए जाने से पहले करीब 8 लाख टन चीनी विदेश भेजी जा चुकी थी।
E20 इथेनॉल से कितना पड़ा असर?
चीनी की कीमतों में तेजी के पीछे इथेनॉल उत्पादन को भी एक अहम वजह माना जा रहा है। रेटिंग एजेंसी ICRA के अनुमान के मुताबिक 2025-26 में भारत का सकल चीनी उत्पादन करीब 3.11 करोड़ टन रह सकता है। इसमें से लगभग 31 लाख टन चीनी के बराबर मात्रा इथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल होने का अनुमान है। इसका मतलब है कि घरेलू चीनी जरूरतों के लिए करीब 2.80 करोड़ टन ही उपलब्ध रह सकता है।
भारत में इथेनॉल उत्पादन के लिए करीब 67 फीसदी हिस्सा मक्का, खराब अनाज और चावल के टुकड़ों जैसे स्रोतों से आता है, जबकि लगभग 33 फीसदी हिस्सा गन्ने और उसके उत्पादों, खासकर शीरे से आता है।
ऑल इंडिया डिस्टिलर्स एसोसिएशन के अनुसार भारत ने करीब 720 करोड़ लीटर इथेनॉल का उत्पादन किया है, जिसके लिए लगभग 25 लाख टन चीनी बनाने वाले गन्ने और शीरे का इस्तेमाल हुआ।
कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स के शंकर ठक्कर ने भी गन्ने के इथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल को लेकर चिंता जताई है। उनका कहना है कि पिछले तीन वर्षों से लगातार यह आशंका जताई जा रही थी कि इथेनॉल के लिए गन्ने का इस्तेमाल चीनी की उपलब्धता पर असर डाल सकता है और मौजूदा हालात में यही देखने को मिल रहा है।
त्योहारों से पहले बढ़ी सरकार की चिंता
देश में त्योहारों का सीजन शुरू होने वाला है। ऐसे समय में चीनी की मांग आम दिनों के मुकाबले बढ़ जाती है। मिठाइयों, बेकरी उत्पादों और घरेलू खपत में चीनी की मांग बढ़ने से कीमतों पर और दबाव पड़ सकता है।
भारत दुनिया के सबसे बड़े चीनी उत्पादक देशों में शामिल है, लेकिन इस साल घरेलू स्टॉक और उपलब्धता को लेकर स्थिति ऐसी बनी है कि करीब एक दशक बाद देश को चीनी का आयात करना पड़ रहा है। भारत में सालाना चीनी की खपत करीब 280 लाख टन है।
अब सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती त्योहारों के दौरान पर्याप्त चीनी की उपलब्धता सुनिश्चित करने और कीमतों को नियंत्रित रखने की है। आने वाले दिनों में सरकार की नीतियां, आयात और घरेलू स्टॉक की स्थिति यह तय करेगी कि चीनी की कीमतें 70 रुपये के स्तर से नीचे आती हैं या फिर महंगाई की यह मिठास और कड़वी होती है।