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मच्छरों के खिलाफ ‘आयरन डोम’! AI और ब्लू लेजर से पलक झपकते ही होगा मच्छरों का खात्मा, कीमत 1 लाख तक
 

 

मच्छर आकार में भले ही बेहद छोटे हों, लेकिन उनसे फैलने वाली बीमारियां पूरी दुनिया के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई हैं। मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया और जीका वायरस जैसी बीमारियों के कारण हर साल लाखों लोग प्रभावित होते हैं। ऐसे में अब मच्छरों से निपटने के लिए तकनीक का सहारा लिया जा रहा है। इसी कड़ी में AI, रडार और ब्लू लेजर तकनीक से लैस ‘फोटॉन मैट्रिक्स’ चर्चा में है, जिसे मच्छरों का ‘आयरन डोम’ कहा जा रहा है।

रडार से खोजता है मच्छर, लेजर से करता है खत्म

यह सिस्टम आसपास उड़ रहे मच्छरों का पता लगाने के लिए एडवांस सेंसर, LiDAR, रडार और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल करता है। सिस्टम मच्छर की दूरी, आकार और उड़ने की गति का अनुमान लगाने के बाद उसे टारगेट करता है।

इसके बाद सिस्टम की ब्लू लेजर बीम मच्छर पर केंद्रित होती है और उसे खत्म कर देती है। खास बात यह है कि इसमें मच्छरों को मारने के लिए किसी केमिकल या जहरीले स्प्रे की जरूरत नहीं पड़ती।

कंपनी के मुताबिक, सिस्टम दूसरे उड़ने वाले कीड़ों को छोड़कर खास तौर पर मच्छरों को पहचानकर निशाना बना सकता है। यही वजह है कि इसे घरों, गार्डन और दूसरे खुले स्थानों में मच्छरों से सुरक्षा के लिए एक हाईटेक विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है।

इजरायल के आयरन डोम से क्यों हो रही तुलना?

मच्छर मारने वाले इस सिस्टम की तुलना इजरायल के आयरन डोम और आयरन बीम जैसे डिफेंस सिस्टम से की जा रही है। हालांकि दोनों का उद्देश्य और तकनीक अलग है, लेकिन काम करने का मूल सिद्धांत कुछ हद तक समान है—पहले लक्ष्य का पता लगाना, फिर उसे ट्रैक करना और अंत में सटीक तरीके से उसे निष्क्रिय करना।

इजरायल का आयरन डोम आने वाले रॉकेट जैसे खतरों को डिटेक्ट कर उन्हें इंटरसेप्ट करता है, जबकि लेजर आधारित आयरन बीम सिस्टम हाई-एनर्जी लेजर से लक्ष्य को गर्म करके नष्ट करता है।

इसी तरह मच्छर नियंत्रण के लिए इस्तेमाल होने वाली यह तकनीक भी सेंसर और AI की मदद से छोटे से छोटे उड़ते लक्ष्य को पहचानकर उस पर लेजर केंद्रित करती है।

20 फीट तक की लक्ष्य सीमा, कीमत करीब 1 लाख रुपये

फोटॉन मैट्रिक्स के इस सिस्टम के इनडोर और आउटडोर वर्जन बताए गए हैं। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, इनडोर मॉडल की कीमत करीब 988 डॉलर, जबकि आउटडोर मॉडल की कीमत करीब 1,088 डॉलर है।

भारतीय मुद्रा में इसकी कीमत लगभग 94 हजार रुपये से 1.05 लाख रुपये के बीच बैठती है। सिस्टम की LiDAR आधारित लक्ष्य सीमा करीब 20 फीट बताई जाती है। कंपनी का दावा है कि यह सिस्टम बेहद कम आवाज में काम करता है।

क्यों बढ़ रही है ऐसी तकनीक की जरूरत?

मच्छर सिर्फ परेशानी पैदा करने वाला कीड़ा नहीं है, बल्कि कई गंभीर बीमारियों का वाहक भी है। दुनिया के करीब 4 अरब लोग मच्छर जनित बीमारियों के जोखिम में बताए जाते हैं। जलवायु परिवर्तन, बढ़ता शहरीकरण और बदलता मौसम मच्छरों के फैलाव को नए क्षेत्रों तक पहुंचाने में भूमिका निभा रहे हैं।

मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया और जीका जैसी बीमारियों के अलावा वेस्ट नाइल वायरस भी मच्छरों के जरिए फैलता है।

वेस्ट नाइल वायरस ने बढ़ाई चिंता

अमेरिका के कैलिफोर्निया में वेस्ट नाइल वायरस को लेकर भी चिंता बनी हुई है। यह वायरस संक्रमित पक्षियों से मच्छरों और फिर मच्छरों के काटने के जरिए इंसानों तक पहुंच सकता है। ज्यादातर संक्रमित लोगों में गंभीर लक्षण नहीं दिखते, लेकिन कुछ मामलों में बुखार और तंत्रिका तंत्र से जुड़ी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं।

खासकर बुजुर्गों और कुछ पहले से मौजूद स्वास्थ्य जोखिम वाले लोगों में गंभीर बीमारी का खतरा अधिक हो सकता है।

मच्छर कितना खतरनाक है?

दुनिया में मच्छरों की 3,700 से ज्यादा प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें से कुछ प्रजातियां इंसानों में गंभीर बीमारियां फैलाती हैं।

मलेरिया आज भी दुनिया की सबसे बड़ी मच्छर जनित स्वास्थ्य चुनौतियों में शामिल है। विश्व स्तर पर हर साल लाखों लोग मलेरिया से प्रभावित होते हैं और बड़ी संख्या में मौतें भी होती हैं। डेंगू का प्रसार भी लगातार चिंता का विषय बना हुआ है।

यही वजह है कि मच्छरों को नियंत्रित करने के लिए दवाओं, जालियों और पारंपरिक उपकरणों के साथ अब AI और लेजर आधारित तकनीक पर भी ध्यान दिया जा रहा है।

आखिर मच्छर इंसान को ढूंढता कैसे है?

मच्छरों के इंसानों तक पहुंचने के पीछे भी बेहद दिलचस्प विज्ञान है। मच्छर इंसानों की सांस से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड, शरीर की गर्मी और पसीने व शरीर की गंध से जुड़े रासायनिक संकेतों को पहचान सकते हैं।

यही संकेत उन्हें अंधेरे में भी इंसान तक पहुंचने में मदद करते हैं। यही कारण है कि कुछ लोगों को दूसरों की तुलना में मच्छर ज्यादा काटते हुए महसूस होते हैं।