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RBI क्यों बढ़ा सकता है रेपो रेट? जानिए आपकी जेब पर कितना पड़ेगा असर

 

Mumbai : एक तरफ अखबारों में बढ़ती महंगाई की खबरें, दूसरी तरफ पेट्रोल-डीजल और CNG के बढ़ते दाम, और फिर RBI की ओर से रेपो रेट बढ़ाने के संकेत… देखने में ये अलग-अलग घटनाएं लग सकती हैं, लेकिन असल में ये एक ही आर्थिक चक्र की कड़ियां हैं। अर्थशास्त्र की भाषा में इसे “महंगाई का दुष्चक्र” कहा जाता है।

यह दुष्चक्र तब शुरू होता है जब वैश्विक संकट, युद्ध या खराब मौसम जैसी घटनाएं सीधे आम आदमी की जेब पर असर डालने लगती हैं।

पहली चिंगारी: तेल और खाद्य संकट

1. कच्चे तेल की कीमतों में विस्फोट

मिडिल ईस्ट में बढ़ते युद्ध और तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। खासकर होर्मुज स्ट्रेट में सप्लाई प्रभावित होने से तेल 70 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर करीब 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया।

भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए इसका सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। अप्रैल 2026 में देश की थोक महंगाई दर (WPI) बढ़कर 8.30% तक पहुंच गई, जो पिछले 42 महीनों का सबसे ऊंचा स्तर माना जा रहा है।

सबसे ज्यादा असर “फ्यूल एंड पावर” सेक्टर पर पड़ा, जहां महंगाई दर 24.71% तक पहुंच गई। कच्चे तेल की थोक महंगाई 88% और पेट्रोल की करीब 32% तक दर्ज की गई।

2. अल नीनो और कमजोर मानसून

महंगाई के इस संकट को मौसम ने और गंभीर बना दिया है। मौसम विभाग के अनुसार 2026 में मानसून सामान्य से कमजोर रहने की आशंका है। इसकी बड़ी वजह “सुपर अल नीनो” को माना जा रहा है।

कम बारिश का मतलब है फसलों का कम उत्पादन। धान, सोयाबीन और कपास जैसी प्रमुख फसलों पर इसका सीधा असर पड़ेगा, जिससे खाद्य पदार्थ महंगे होंगे।

कैसे कंपनियों से होकर आपकी जेब तक पहुंचता है असर?

कंपनियों की लागत बढ़ती है

जब डीजल, बिजली और कच्चा माल महंगा हो जाता है, तो फैक्ट्रियों और कंपनियों की उत्पादन लागत भी बढ़ जाती है। अप्रैल 2026 में मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स की महंगाई दर 4.62% तक पहुंच गई।

फिर महंगाई ग्राहक तक पहुंचती है

तेल कंपनियों का घाटा बढ़ता है, इसलिए पेट्रोल-डीजल महंगा करना मजबूरी बन जाता है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि पेट्रोल और डीजल में 4-5 रुपये प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी संभव है।

जब डीजल महंगा होता है, तो ट्रांसपोर्ट खर्च बढ़ता है। ट्रकों से आने वाला हर सामान — सब्जी, दूध, राशन, दवा — सब महंगे होने लगते हैं।

RBI की एंट्री: और बढ़ सकती है EMI

जब महंगाई बहुत बढ़ जाती है, तो उसे नियंत्रित करना Reserve Bank of India की जिम्मेदारी होती है।

RBI महंगाई रोकने के लिए रेपो रेट बढ़ा सकता है। रेपो रेट वही दर होती है जिस पर बैंक RBI से कर्ज लेते हैं।

रेपो रेट बढ़ा तो क्या होगा?

- बैंकों के लिए पैसा महंगा हो जाएगा

- बैंक होम लोन और कार लोन की ब्याज दरें बढ़ा देंगे

- आपकी EMI बढ़ जाएगी

यानी एक तरफ रसोई और पेट्रोल का खर्च बढ़ेगा, दूसरी तरफ लोन की किस्तें भी भारी हो जाएंगी।

आखिर इसे “दुष्चक्र” क्यों कहा जाता है?

इस पूरी प्रक्रिया में हर समस्या दूसरी समस्या को जन्म देती है:

- युद्ध और अल नीनो से तेल व खाद्य पदार्थ महंगे होते हैं

- कंपनियों की लागत बढ़ती है

- सामान और ट्रांसपोर्ट महंगे होते हैं

- खुदरा महंगाई बढ़ती है

- RBI ब्याज दरें बढ़ाने पर मजबूर होता है

- EMI बढ़ती है और आम आदमी की बचत घट जाती है

यही लगातार घूमता हुआ आर्थिक दबाव “महंगाई का दुष्चक्र” कहलाता है।

सबसे ज्यादा असर किस पर?

इसका सबसे बड़ा असर मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों पर पड़ता है, क्योंकि उनकी आय सीमित होती है लेकिन खर्च तेजी से बढ़ने लगते हैं।

फिलहाल सरकार और तेल कंपनियां कीमतों को नियंत्रित रखने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन वैश्विक हालात और मौसम की अनिश्चितता को देखते हुए आने वाले महीनों में महंगाई बड़ी चुनौती बनी रह सकती है।