ट्रम्प का ‘महाशांति सौदा’ या ‘मृत्यु समझौता’? गाज़ा में शांति नहीं, नई तबाही की पटकथा लिखी जा रही है!
Trump Gaza Peace Deal: दो साल बाद भी गाज़ा जल रहा है। आज से ठीक दो साल पहले, दुनिया ने वह दिन देखा था जब हमास ने इज़राइल पर हमला किया। एक खूनी हमला जिसने 200 से अधिक बंधकों को गाज़ा की सुरंगों में कैद कर लिया। उस दिन की आग आज भी बुझी नहीं है। करीब 70,000 से ज़्यादा जानें जा चुकीं, और अपने 13 सूत्रीय महान शांति कार्यक्रम के साथ डोनाल्ड ट्रम्प लौटे हैं। पर सवाल यह है - क्या यह शांति योजना है, या एक राजनीतिक जाल जो गाज़ा के नाम पर लिखा गया है लेकिन असल में किसी की कब्र का नक्शा है?
THE GREATEST PEACE DEAL EVER! — ट्रम्प का दावा
Trump Gaza Peace Deal
ट्रम्प का दावा सुनने में शानदार लगता है - 'नो ब्लड, नो बॉम्ब्स, जस्ट ह्यूज हग्स!' लेकिन उनके 'हग्स' की गर्मी में राजनीतिक ठंडापन झलकता है। यह समझौता किसी शांति संधि से ज्यादा एकतरफा आत्मसमर्पण पत्र जैसा है- जैसे सोने के कागज में लिपटा हुआ ‘सुसाइड पैक्ट’।
समझौते की सच्चाई: जब ‘सुलह’ का मतलब मिट जाना हो। ट्रम्प की योजना में लिखा है - “हमास अब से अस्तित्व में नहीं रहेगा।” एक ऐसा समझौता जहाँ एक पक्ष को मिट जाना है, और दूसरे को उसके खंडहरों पर “ट्रम्प टावर” बनाना है। क्या यही है शांति? या यह है ‘Solve by Dissolve’ की राजनीति — दुश्मन को खत्म करो, फिर कहो हमने शांति कर ली?
जब शांति का पहरेदार ही भूत बन जाए
समझौते (Trump Gaza Peace Deal) के बाद सवाल उठता है - अगर हमास खत्म हो जाएगा, तो पालन कौन करेगा? कौन सुनिश्चित करेगा कि गाज़ा की ज़मीन पर “वादा निभाया जाए”? क्या कोई ‘भूतिया हमास अधिकारी’ मलबे के बीच से चेकलिस्ट टिक करेगा? और जो बचेंगे, वे होंगे निर्वस्त्र नागरिक, जिनसे कहा जाएगा — अब आज़ादी नहीं, आज्ञाकारिता का समय है। गाज़ावासी? उनकी कोई राय नहीं, उनका बस “आदेश पालन” का अधिकार है।
अरब दुनिया की खामोशी — ‘समर्थन’ या ‘सहमति का अपराध’?
सऊदी अरब कहता है, हम स्थिरता चाहते हैं। मिस्र सिर हिलाता है — डॉलर और विकास चाहिए। जॉर्डन कहता है — हमारा शांति समझौता पहले से है। सभी देशों की भाषा एक जैसी है — समर्थन है, पर बिना जोखिम के। यह है ‘डिप्लोमैटिक लाइक’ - बिना पढ़े लाइक करना, बिना समझे समर्थन देना।
पाकिस्तान की ‘पलटी’: समर्थन से संशय तक
पहले दिन शहबाज़ शरीफ़ ने कहा, यह समझौता साहसिक कदम है। एक हफ्ते बाद ही बयान आया- पुनर्विचार चल रहा है। क्यों? शायद बीजिंग से कोई फुसफुसाहट आई, या बस एहसास हुआ कि एक सुन्नी संगठन को मिटाने वाला समझौता उनके अपने इस्लामी नैरेटिव के खिलाफ जाता है। पाकिस्तान ने वही किया जो वह हमेशा करता है - ऊपर से समर्थन, भीतर से विरोध।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इस समझौते में फिलिस्तीनी अथॉरिटी (PA) को आमंत्रित ही नहीं किया गया! जो संगठन संयुक्त राष्ट्र में फिलिस्तीन की आवाज़ है, उसे ट्रम्प ने “अनावश्यक इन-लॉज़” की तरह बाहर रख दिया। यह शांति नहीं, यह ‘कॉलोनियल कॉसप्ले’ है - जहाँ पश्चिमी ताकतें तय करेंगी कि अरब दुनिया कैसे जिए, और कैसे मरे।
इज़राइल की स्थिति: 'दो-राष्ट्र' नहीं, 'एक कब्ज़ा' नीति
इज़राइल के लिए यह सौदा एक ‘परफेक्ट फिक्स’ है। गाज़ावासियों को मिस्र भेजो, वेस्ट बैंक रख लो, और दुनिया के सामने कहो - हमने शांति कर ली। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के लिए यह “विन-विन” है - ना कोई जमीन छोड़ी, ना कोई जवाबदेही ली।
शांति का पिरामिड या राजनीति का स्कैम?
यह सौदा किसी ‘पीस ट्रीटी’ (Trump Gaza Peace Deal) से ज़्यादा ‘पॉलिटिकल पिरामिड स्कीम’ है। ऊपर अमीर ताकतें, नीचे दबे हुए लोग और ट्रम्प खुद उस पिरामिड के टॉप पर बैठे हैं - हाथ में कलम लिए हैं, और आंखों में नोबेल प्राइज़ का सपना।
ट्रम्प की शांति, गाज़ा की बर्बादी
ट्रम्प कहते हैं - आर्ट ऑफ द डील, पर गाज़ा में एक ही आर्ट बचा है — आर्ट ऑफ सर्वाइवल। यह सौदा किसी स्थायी समाधान का रास्ता नहीं खोलता, बल्कि भविष्य के और बड़े संघर्षों का दरवाज़ा खोलता है। क्योंकि जब आप एक विचारधारा को मिटाने की कोशिश करते हैं, तो वह और उग्र रूप में लौटती है। यह सौदा शांति नहीं लाएगा, यह बस एक नए ग़ुस्से, नए हथियार और नई पीढ़ी के ग़म को जन्म देगा।
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