अमेरिकी दबाव के बावजूद रूस टॉप सप्लायर, फरवरी में भी भारत का नंबर-1 तेल स्रोत बना मॉस्को
New Delhi : अमेरिका के उच्च टैरिफ और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दबाव के बावजूद रूस से कच्चे तेल का आयात कम करने की कोशिशों के बाद भी, फरवरी 2026 में रूस भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बना रहा। ग्लोबल एनालिटिक्स फर्म Kpler के आंकड़ों के अनुसार, फरवरी में भारत ने रूस से औसतन 1 मिलियन बैरल प्रतिदिन (mbd) से थोड़ा अधिक कच्चा तेल आयात किया, जो जनवरी के 1.1 mbd और दिसंबर 2025 के 1.2 mbd से मामूली कमी दर्शाता है।
हालांकि, सऊदी अरब से आयात में तेज उछाल आया। Kpler डेटा के मुताबिक, फरवरी में सऊदी से आयात बढ़कर 1.01 से 1.05 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया, जो जनवरी के लगभग 7.7 लाख बैरल प्रतिदिन से करीब 30% अधिक है। यह पिछले छह वर्षों में सऊदी से भारत का सबसे ऊंचा मासिक आयात स्तर है। इस वजह से सऊदी ने रूस के साथ अंतर काफी कम कर दिया है।
पश्चिम एशिया पर बढ़ती निर्भरता और होर्मुज जोखिम
पिछले दो-तीन महीनों में भारत की पश्चिम एशियाई देशों (सऊदी अरब, इराक, यूएई, कुवैत आदि) पर तेल निर्भरता बढ़ी है। Kpler के लीड रिसर्च एनालिस्ट सुमित रितोलिया के अनुसार, रूस से आयात में कमी के बाद रिफाइनर्स ने खाड़ी देशों से सप्लाई बढ़ाई। वर्तमान में होर्मुज जलडमरूमध्य से भारत को रोजाना 2.5 से 2.7 मिलियन बैरल तेल मिल रहा है, जो कुल आयात का लगभग आधा है।
लेकिन अमेरिका-इजरायल-ईरान संघर्ष के कारण होर्मुज में शिपमेंट अनिश्चित हो गया है। ईरान की ओर से जलडमरूमध्य बंद करने की घोषणा और हमलों के बाद कई जहाजों ने मार्ग बदल लिया है, जिससे सप्लाई चेन में जोखिम बढ़ गया है। यदि तनाव लंबा खिंचा तो भारत के लिए ईंधन की कमी का खतरा मंडरा सकता है। भारत के पास करीब 40-45 दिनों के लिए पर्याप्त स्टॉक (कमर्शियल और स्ट्रैटेजिक रिजर्व) हैं, लेकिन लंबे व्यवधान से कीमतें और महंगाई प्रभावित हो सकती हैं।
वैकल्पिक रणनीति पर विचार
विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय रिफाइनर्स अब अफ्रीका, अमेरिका, लैटिन अमेरिका या अन्य स्रोतों की ओर रुख कर सकते हैं ताकि जोखिम कम हो। कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया है कि सरकार और रिफाइनर्स रूस से आयात बढ़ाने पर भी विचार कर रहे हैं, क्योंकि रूसी तेल की बड़ी मात्रा एशियाई जल में उपलब्ध है (लगभग 9-10 मिलियन बैरल फ्लोटिंग स्टोरेज में)। अमेरिकी दबाव के बावजूद रूस से सस्ती कीमतों पर सप्लाई मिल सकती है।
भारत फिलहाल संतुलित रणनीति पर टिका है—रूस से प्रतिस्पर्धी कीमतें, खाड़ी से स्थिर आपूर्ति और विविधीकरण। आने वाले महीनों में तेल बाजार की दिशा पश्चिम एशिया की भू-राजनीतिक स्थिति, होर्मुज की स्थिति और वैश्विक कीमतों पर निर्भर करेगी। तेल की कीमतें पहले ही बढ़ चुकी हैं और लंबे संकट से भारत की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ सकता है।
